Monday, 19 March 2018

ललकी गमछी

#ललकी_गमछी
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ललकी गमछी बड़ी काम की
ख्याति इसकी गजब नाम की।
सर पे रखो तो ताज हैं,
समाज का मान-मरजाद है।
गले में रखो तो हार हैं,
भोजपुरिहा का उपहार हैं ।
बोझ सहने में सहायक हैं,
सुखद, सहज और लायक हैं ।
कमर में बाँधों कमरबंद बनती हैं
फुरती, साहस और जुनून भरती हैं ।
नहाने के बाद मुख्य जरूरत हैं,
सोचो इसकी कितनी अहमियत हैं ।
ज़ख्म को बाँधने में सहायक हैं,
बोझ बाँधने में भी एकदम लायक हैं ।
         
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sujit1992.blogspot.com

Friday, 9 March 2018

एक यात्रा ऐसा भी ।

#एक_यात्रा_ऐसा_भी

आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो  से जाने  का नहीं  था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।

बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते,  चलना है  क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!

मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।

हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।

रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?

अवाक हुआ  इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।

याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?

दिये निकाला  रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।

वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।

एक यात्रा ऐसा भी ।

#एक_यात्रा_ऐसा_भी

आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो  से जाने  का नहीं  था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।

बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते,  चलना है  क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!

मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।

हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।

रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?

अवाक हुआ  इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।

याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?

दिये निकाला  रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।

वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।

Wednesday, 7 March 2018

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस ।

मैं नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।

मैं जन्म की जननी हूँ,
पालन करती हुँ, पोषण करती हूँ,
भूखे तन को तृप्त करती हूँ तन से ।
रोते हुए बच्चे को गले लगाती हुँ,
सर सहलाती हुँ,आँचल का अम्बर बनाती हुँ
लोरिया सुनाती हुँ खुद जग-जगकर ।
मैं एक नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
जिस घर में पैदा लेती हूँ,
बोझ बनती हुँ, बिन भविष्य के सुन,
सहती हुँ हर चिर-वियोग और ताने-बाने
आजाद नहीं इस खगोल पर
चौखट के अंदर सब सहती हुँ,
रीति-रिवाजों की कड़ियों से बंधी सुलगती
मैं एक नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
किसी ने मेरी अस्मिता लूटी
देख उसे किसी ने त्याग किया
पत्थर शिला को देख किसी ने उद्धार किया
बस यही मेरी कहानी है ।
अब देर नहीं, सबेर नहीं
तोड़ूंगी हर बंधन को मैं
नित नए रूप दिखाउँगी 
दैत्यों को सबक सिखाऊँगी
मैं नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।

Sunday, 4 March 2018

दो राजधानियों की प्रेम कहानी ♥️👇👇

दो राजधानियों की प्रेम ♥️ कहानी
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यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है. क़िरदार की भूमिका कहानी से अगर कुछेक अंश भी मिलती हैं तो लेखक को बड़ी खुशी होगी ।

ख्वाबों की दुनिया में चलते हुए अगर कदमों की चाल हकीकत में तब्दील होने लगे। नींबू जैसा मन पपीता की तरह पीला और बड़ा होने लगे तो वही अहसास है प्यार का.... 

वक़्त नदी है, दोनों छोर क्रमशः किनारे का रूप हकीकत और ख़्वाब होते है। एक छोर से दूसरे छोर के बीच उम्मीदों का बांध बाँध तो सकते है पर टिकना संभव कहाँ?

दरअसल यह कहानी दो जीव, दो दिल, दो जिस्म या दो जिंदा दिली प्रेमी-प्रेमिका का ही नहीं है अपितु दो राजधानियों का मिलन है। दिल्ली हमारे देश की राजधानी हैं और लखनऊ भी यूपी की। आज यही दो राजधानियों के बेमेल दो दिलों की हाल-ए-दास्तां सुनाता हूँ ।
कहते है कि किसी प्यार किसी धर्म, सम्प्रदाय, बड़ा-छोटा,कृत-विकृत या गोरा-काला में विभेद नहीं करता, यह तो एक जादू है जो एहसासों के तवे पर पकना शुरू होता है और पकते-पकते किसी का उतर जाता है या किसी को जीवन भर पकाता है।
##

संगीत की दुनिया अजीब है दोस्तों। क्या खूब अपनी आवाज से दिल तक अपनी बातों को मनवाने लगता है, लोकतांत्रिक देशों में भी एक अलग सा साम्राज्य स्थापित करने के सपनें सजाने लगता है। जैसे कि मैं उसके दिल का राजा होता, वो हरपल मेरे बारे में सोचती रहती और मैं उसके। जब इश्क़ का सुरूर चढ़ता है तो सोचने का पैमाना लुल हो जाता है ।

याद करा दूँ, दिल्ली का इतिहास बहुत पुराना और दिलचस्प है । इसका उल्लेख महाभारत काल में हुआ है जब हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र ने पांड्वो को इसी के आसपास का क्षेत्र दिया था, तब वे इस नगर को बसाये थे और इन्द्रप्रस्थ नाम दिए थे।  कालान्तर में इसकी गरिमा दिल्ली सल्तनत के नाम हुई, परंतु यह अभिशाप रहा इसकी बागडोर बदलती रही। कहते है, यहाँ की भूमि रक्त से सिंचित है। सत्ता की लालच लिए लाखों लोगों की बलि बनी यह धरा.... हम तो दिल्ली को मिर्जा ग़ालिब के शहर  से जानते है। जो इस शहर को शायरी की दुनिया से रूबरू कराया, हर नौजवानों की जुबां इनकी अभी भी पकड़ है।

नदी का दूसरा छोर, लखनऊ भी अपने अतीत काल से ही विख्यात रहा है। प्राचीन कोसल राज्य, जो भगवान राम के अधीन था, को लक्ष्मण जी को समर्पित किये थे और लक्ष्मणपुर  से नाम बदलकर लखनऊ बना । यह नबाबों का शहर है, नवाब आसफ़ुद्दौला ने इसे समृद्ध किया। यह शहर  चिकन कढ़ी, और आम उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के मशहूर शायर मजाज लखनबी, मात्र 44 साल धरा पे रहकर अपने शायरी में जो अद्वितीय प्रसिद्धि पाई वो उल्लेखनीय है ।  कवि कुमार विश्वास जी कहते है कि इनकी लिखी किताब उस समय  एक दिन के लिये ही खास खास लोगो को मिलती थी, तब आज के जैसा युग नहीं था, वरन कॉपी पेस्ट मारकर घर-घर मे सैकड़ो प्रतियां होती ।

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अरे, हम असली कहानी तो भूल गये थे।
जैसा की ऊपर बताया दोनो शहर महाभारत और रामायण का हिस्सा रहा है, उसी तरह दोनों राजधानियों की प्रेम कहानी भी बिल्कुल माधुर्यता, सम्मोहक, और उत्कटपूर्ण है ।

रविआ की जिंदगी भी कुछ इसी कदर गुजर रही थी। नये सपनें थे, नई उमंगे थी और पहली बार असल प्यार की जिंदगी में जीने अहसास हुआ था। पिछले एक महीना से न तो खाना-पीना नीक लग रहा था और न ही नींद आ रहा था, बस मोबाइल में पता नहीं क्या क्या टिप-टॉप करते रहता । दिल्ली में रहकर यूपीएससी की तैयारी करने वाला रबी होली में घर आया। परिवार वाले बहुत खुश थे, गाँव के लड़के भी खुश थे कि होली खेलने वाला दोस्त घर आया है।  रबी की आधी रात तन्हाई में गुजर रहा था। मन की हिलोरें झोंके से चलती फिर एकाएक शांत हो जाती। होली के दिन वो घर में ही दुबके रहा और मोबाइल में ही लगा रहा। दादी को लग रहा था कि आज कल की डिजिटल इंडिया में पढ़ाई की वजह से मोबाइल पर ही पढ़ रहा होगा। मोबाइल की पढ़ाई में तल्लीन देखकर पूरे घर वाले आस लगाए है कि रबिया कोई अच्छा जॉब पकड़ेगा।
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रवि अपने कोचिंग का सबसे टॉपर लड़का है। हर सवाल को बखूबी सॉल्व कर देता, लूसेन्ट तो मुंहजबानी याद है। लेकिन इस बीच दो महीना के लिए आई पूर्णिमा की नजर रबि पर पड़ी, फिर क्या था । नजर की नजाकत ने ऐसा नजरिया बदला की नजरें बदल गई।
दो महीना दो दिन की तरह गुजरा, बीसवें दिन एक दूसरे की निगाहें नाज़िर हुई और सप्ताह में पाँच दिन का क्लास शनि, रवि की छुट्टी,गई तो गई, पर छीन गई सुनहले सपनें, आंख का सूकून, तन का चैन और एक पहाड़ सा दर्द का मंज़र..........
छोड़ गई वो पिंक हेयर क्लिप जो पीछे से दूसरे बेंच से  एक पराबैगनी किरणें निकलकर आ रही थी, जो सिर्फ उसे ही आकर दिखती और उसकी बात बात पर अवरोध करने वाली बीमारी ..असल में वो बीमारी नहीं थी, वही तो था सुकून देने वाला पल, कलेजे को ठंडक पहुँचाने वाली आवाज और नटखटी निराली अंदाज़ जिसे सुनकर ऐसा महसूस होता जैसे राजस्थान के मरुस्थल में बाढ़ आ गया है, मरुस्थल में मरे घास-पात, पेड़ पौधे अब जी गए है, ठूठ शिरीष और बबूल के पेड़ो में भी हरियाली आ गई हो!

वो बीता हुआ शुक्रवार का शूकर है जिंदगी भर याद रहेगी, उस मिरजई आंखें और वह अदा जिसका शिकार था रवि।  जब एक हल्की मुस्कान के साथ रास्ते से गुज़री और बोली...

Hi,,, ravi
How r u????
Meet me after class......

रवि के चेहरे से तो अवरक्त किरणें निकल रही थी, जो छन में सबको जलाकर प्यार की एक जिंदगी जीने का मजबूर कर रही थी। उसकी पिंक जूतियाँ, पिंक टीशर्ट और पिंक हेयर क्लिप जिसकी त्रिविमीय किरणों से बने केंद्र उसकी आँख थी, रेखा खण्ड को कितने डिग्री का कोण बना रही है, सोचने में डूब गया ।

क्लास खत्म होने के बाद मिनट भर के लिए भेंट हुआ । हाथों से हाथ इस तरह कस के पकड़ा जैसे कि इसकी छुअन जिंदगी भर भूले नहीं, फिर क्या था, कमीने दोस्तो ने आवाज लगा दी। रबी का मुंह पूरी तरह लाल हो चुका था। खरबूजे का पकना भला कौन नहीं पहचाने।  बस क्या था, उसी दिन से इश्क़ में गिरफ्तार हुआ,अब कैदी बना चुका था। हर सोच पूर्णिमा से ही शुरू और खत्म हो जाती । वो उसके जाने का दिन था पर कमीने दोस्तों की वजह से ठीक से नहीं मिल पाया था । 10 दिन बाद ट्विटर अकाउंट पर एक फॉलो आया, देखा तो लिखा था,
Purnima Sharma follow u.......
आगे के लिए थोड़ा इंतज़ार करें
मन का राही
गोप भरौली, बक्सर

Wednesday, 28 February 2018

बसन्ती बयार ~ हैप्पी होली ♥️♥️

एक छोटा सा गाँव है।
गोप भरौली, सिमरी,बक्सर....जहाँ की आबादी है लगभग 1200, कुछ नए आने वाले मेहमानों को छोड़कर ... भले ही इस बार वेलेंटाइन-डे खूब मना है। कुछ नई शादियां भी हुई है, अनुमानों के आंकड़े  कुछ इधर-उधर हो सकते है। हाँ, ..इतना जरूर कहूँगा की इस बार की ठंडी में गाँव के बुजुर्गों का स्वास्थ्य अच्छा रहा, पूड़ी नहीं दिये...... ईश्वर करें! इसी तरह स्वस्थ, सुखी और परिवार का मार्गदर्शन करते रहें।
जैसा कि सर्वविदित है, हर किसी का बचपन पूरे जीवन रूपी कालखण्ड से प्यारा, अनोखा और खूबसूरत होता है। मेरा भी अच्छा चल रहा था। मुझे बचपन के हर किस्से हुबहू तो याद नहीं, पर कुछ ऐसे जो अभी तक दिल में दस्तक जमाये हुए है, अच्छी तरह से याद है .......
बंसन्त का महीना चल रहा था । शाम के समय में वातावरण में नमी था..ना ज्यादा गर्मी और ना ही ज्यादा सर्दी ...जैसा कि हर बंसन्त में होता है। अभी घंटे भर पहले रवि अस्त हुए थे... शशि अभी अपने क़ायनात से बाहर भी नहीं हुए थे। कहते है कि रवि और शशि एक साथ अपना प्रभाव नहीं दिखाते, लेकिन गांव में रवि और शशि की दोस्ती बेमिसाल थी,जहाँ निकलते साथ ही निकलते। हालाँकि की आजकल सुलभ घर घर बन जाने से लोगों का बाहर लोटा लेकर निकलने की प्रथा कम हुई है। नहीं तो पुरुब टोला से पछिम टोला गाँव के बाहर से ही सीटी संकेतक होता। जो पहले निकलता एक सीटी मार देता,मंद मंद पुरुआ हवा बह रही थी ।

हम अभी अपने पुराने वाले ही घर थे। जहाँ से आज भी बड़े बुजुर्गों, पड़ोस के भईया, चाचा-चाची, रंगीला काका, बटेशर जादो और दर्जनों भर लोगों के साथ बिताये सावन भादों की यादें जीवंत है। दुआर पर कुछ गेंदा, गुलाब, अड़हुल के पेड़ों से ख़ुशबू निकलकर वातावरण को सुवासित कर रहा था।

स्कूल से आने के बाद चुपके से 80 की रफ्तार में खरिहान में निकल पड़ते थे, खेल के आगे खाने-पीने की कोई सुध नहीं रहती थी। भले ही खेलकर आने के बाद घर वालों की डांट फटकार लगती रहे। खरिहान एक ऐसा जगह था, अभी भी है पर इसका क्षेत्रफल आधुनिक तकनीकी की मार की वजह से कम होते जा रहा है।  शाम को लड़को का क्रीड़ा केंद्र होता। गुल्ली डंडा, कबड्डी, घोंडा  बैठने वाला खेल आदि, तब आज के जैसा मोबाइल गेम नहीं था, आजकल मोबाइल से ही शारीरिक खेल रूप सभी क्रियाएं हो जाता है, अच्छी बात है । अगर उस समय जिओ का अनलिमिटेड प्लान चलता तो हमारे जैसे लोगों का हालात तो और भी  बद से भी बदतर हो जाता। क्यों सोशल मीडिया का ऐसा  भूत सवार है कि रात के सुबह 5 बजे से रात के 1 बजे तक अपने साये में दबाके रखता है ।

उस समय हमारे गुरु जी स्व श्री सीताराम पाण्डेय जी  साठ बरस उम्र रही होगी और हमलोग वही चौथी, पाँचवी के विद्यार्थी रहे होंगे। तकरीबन दो दशक गुजर जाने के बाद याददाश्त भी अब पहले जैसी नहीं रहीं। समय विकास का बहुत तरक्की किया है।  एक तरह आलू से सोना निकल रहा तो दूसरी तरह हेरा-फेरी नहीं हीरा-फेरी चल रही है । आज कल के विद्यार्थियों का यादाश्त एक दशक भी चल जाये तो कहना मुश्किल ही होगा ।

हर साँझ खेलकुद करने के बाद घर आकर घर वालों से  डाँट फटकार सुनना आदत में शुमार हो गया था। जैसे
1.ई लइका के पैर में शनिचर का बास हो गया है, एक छन भी घर में रहा नही जाता, जब भी टाइम मिलता है, भाग जाता है खलिहान में । ऐसा लगता है इसका चूरूकी वही गड़ा गाया है ।
2.घर के काम को काम नहीं समझता है जब देखो सोनुआ आ अंकितवा के साथ दुम दबा के निकल पड़ता है ।
3. रविवार के दिन छुट्टी होने से बाकी दिन की अपेक्षा डोज कुछ ज्यादा ही मिलता था, पर घर वालों को भी मालूम होता कि लड़का आ बानर में ज्यादा समझ नहीं होता, हॉ इतना जरूर होता कि कभी कभी दो चार झाप लगने के बाद गंगा जमुना की निर्मल धारा प्रवाहित हो जाती  और अगले कुछ घंटे में सब कुछ ठीक हो जाता, खैर"" आजकल के लड़के कुछ ज्यादा ही सीरियस में ले लेते है ।

स्कूल में जाते समय घर से दो तीन रुपये मिलता था जिसमें खर्च करने का मैनेजमेंट MBA के छात्रों से भी ज्यादा दिमाग खपाना पड़ता। 1 रुपये में चार मोटन चाकलेट लेकिन आदमी तो 6 है दाँत से काट कर वितरण करने वाली प्रथा हूबहू याद है और रास्ते मे पड़ने वाले जुताई हुए खेतों के ढेलों से बड़ा चट्टान बनाना, कुछ बिस्कुट और चॉकलेट के टुकड़ों को पंडुक बाबा(पक्षी) और चूहे भगवान या खाने से बरहम बाबा के नाम पर छुपा के रखने अगले सुबह आकर उसे उकेर कर देखना है। बिस्कुट या चाकलेट का टुकड़ा न पाकर भगवान के प्रति आस्तिकता के भाव मे शरधा से सर झुकाना आम बात थी ।

हाँ, मैं तो बसन्त वाली बात तो भूल ही चुका था। गुरु जी अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत अधिक सचेत थे। ठंड में भले आजकल हम गरम पानी पीकर फिटनेस और सेप बनाने, डाइजेशन ठीक करने और हार्ट अटैक से बचने में यूज करने लगे है पर वे उस समय गर्म पानी साथ लेकर चलते थे।

कल रविवार था इसलिए पूरा दिन घूमने-फिरने और शक्तिमान देखने व दोस्तो के साथ घूमने में निकल गया था । टास्क में  गुरु जी ने 20 तक पहाड़ा याद करने के लिए दिए थे, पर मेरी पहाड़ा रूपी गाड़ी की रफ्तार पाँचवे पायदान तक जाकर खड़ी हो जाती, 17, 18 और 19 ये तीनों महाकवि  कालिदास जी के महाकाव्य अभिज्ञानशाकुन्तलम और आचार्य द्विवेदी जी के हिंदी साहित्य काल से भी भारी था।

गुरु जी मेरी दिमाग रूपी गाड़ी में पेट्रोल डालते डालते थक
चुके थे, यदाकदा एक दो छड़ी गुस्से में लगा भी देते पर इसकी ग्लानि उन्हें ही होती,  इसका कोई खास फायदा न पाकर एक नई तरकीब निकाल दिए ।

ये एक शर्त थी ।
शर्त ये थी कि फागुन का महीना चल रहा है और उस समय शादी का लगन बहुत ज्यादा था। वे बोले, मैंने तुम्हारे लिए एक ख़ूबसुनदर लड़की भी ढूंढ़ रखी है। उसके मम्मी-पापा भी शादी के लिए लड़का खोज रहे है लेकिन उनका कहना है कि जो लड़का 20 तक पहाड़ा याद कर लेगा उसी से अपनी लड़की का शादी करेंगे। शर्त मेरे दिमाग में एक घर कर गया और दिमाग में एक नई दुनिया जीने के लिए प्रेरित कर रहा था। बचपन की बचपना में दूल्हे के साथ छोटा लड़का (सहबाला ) का भी तेवर सातवें आसमान पर रहता है ।

अन्त में मैंने 20 तक पहाड़ा तो याद कर लिया पर, चूक हो गया, खाली पड़ गई मेरे सपने की अहसास, एक ऐसा बंसन्त जिसे मैंने 15 साल पहले सपनों की दुनिया मे सजाया करता था। असली गुरु वही होता है जो बच्चों की बचपना समझता है।

खैर,  गुरु जी नहीं रहे!  इसका बहुत पछतावा है। इस बार की होली मैं अपने स्व गुरु जी को समर्पित करता हूँ। वे जहाँ भी हों, जिस रूप में भी हों, हमारी शुभकामना उन तक पहुँचे । एक और खेद है इस होली मैं अपने घर भी नहीं रह पा रहा हुँ, ग्लानि तो है। आप सभी मित्रों को होली की हार्दिक शुभकामना।
रंग भरे इस होली में जम के ख़ुशी मनायें
दुश्मनी   को छोड़  सबको   गले  लगायें ।
कुछ रंग लगाएं और कुछ गुलाल  लगायें
अपना छोड़ औरों के घर का फुआ खायें।।
HAPPY HOLI ♥️✍️ SE .............

सुजीत पाण्डेय छोटू
गोप भरौली, सिमरी, बक्सर ।।


Wednesday, 7 February 2018

अल्फाज़

वक़्त के पन्ने पलटे तो अचानक ख्याल आया
खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ?

बहुत देर लगी खुद को समेटते समेटते
यादों की रेत हवा में ठहर कैसे गई ?

तन्हाइयों के कफन में बंधा है ये जिस्म
मैं तो मिट्टी नही थीं, बिखर कैसे गई ?

हर पल कतरा कतरा मारा था जिसे उम्र भर
अपनी वो लाश पहचानने से आज मुकर कैसे गई ?

बेदम बेजान आरजूओं के जनाजे देखे थे कई
अपनी ही कब्र देखी तो सिहर कैसे गई ?

खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ??

-----    पूर्वा अग्रवाल

Sunday, 21 January 2018

जब जग ने सुनी वीणा की वाणी🎻🎻

ब्रम्हा जी ने हमें PK बना कर भेजा था। मानव पशुवत्व की तरह विचरण कर रहा था । जगत की रचना तो कर दी लेकिन जब पृथ्वी पर वीरान जंगल-जंगल, पहाड़ी-पहाड़ी, नदियों के तीरे तीरे जानवरों की भांति हमें भटकते हुए देखे तो सृष्टि की रचना नाकाम लग रही थी । तब उन्होंने अपना कमंडल से जल निकला और छिड़का तो माँ सरस्वती का प्रकट हुईं।
आप सभी जानते है कि वीणा माँ शारदा के हाथ मे सदैव रहता है और वीणा और वाणी में केवल दीर्घ इ की मात्रा का फेरबदल है । माता ने वीणा से स्वछंद और मधुर ध्वनि निकाली, पुरे देखने वाले हतप्रभ थे, अवाक रह गए और ऊँगली से तारों पर रगड़ने से निकल रही ध्वनि को सुनकर मन ही मन प्रसन्न हुए और माँ ने  श्रीमुख से स्वर निकाला । इसी का प्रतिफल लोगों पर पड़ा और लोगों का पशुवत्व से मानवत्व जीवन में तब्दील हुआ, जय माँ शारदा 
प्रोफेसर साहब पूरे गाँव में फूलों के शौखिन आदमी है । बगीचे में पूरा दिन खुरपी लेकर लगे रहते है। चम्पा, चमेली, तरह तरह के गुलाब, गेंदा, गेंदी, गुलदाउदी, कामिनी, अड़हुल आदि के फूल बोए है।  यू बात करें तो दुनिया का शायद ही कोई फूल होगा जो उनके बगीचे में नहीं मिलेगा । बक्सर नर्सरी का हर फूल उनके बगीचे में मौजूद है।
लेकिन गाँव में उन उदण्ड लड़को की भी कमी नही हैं, करीमन, सोहना और चिन्टूआ ताक में रहते है जब टाइम मिले फूल तोड़ लेते । दिन में पोरफेसर साहब लड़को से परेशान रहते है तो आधी रात में गाँव औरतों से । इसमें कोई शक नहीं कि नौरात्री में नौ दिन रात्रि जागरण पोरफेसर साहब को करना पड़ता है। औरतें  बारह एक बजे रात में ही अपना काम कर लेती । सुबह होता वही तमाशा 
लेकिन इस बार सरस्वती पूजा में पोरफेसर साहब ने अपना आशियाना बगीचे में ही बना रखा है पर उनकी पत्नी हीरा है । गाँव के हर सुख दुख में शरीक रहती है और अभी हमें तो फूल की जरूरत है । फूल की फरमाइश पहले ही पुरुब टोला से चिन्टूआ आ मै पहले ही चाची से कर दिया था।
फोर जी के जुग में भी शाम को गाँव के लोगों का बैठकी का मुख्य केंद्र उनका दुआर है । पुरुब टोला से महेंदर जादो, कमेशर और बीरेंदर और दखिन टोला के शशिकात, भीमकाका भी आ जाते है और पौने नौ बजे के समाचार चाय की घुट के साथ सुनते है पर परसो से पता नहीं किरपवा क्यों पहुँच रहा है ।
पोरफेसर साहब को इस बात का डाउट जरूर है कि गाँव में इस साल चार जगह सरस्वती पूजा रखा जा रहा है और कही न कही लड़के बागीचे के तरफ अपना रुख करेंगे । चाची ने पोरफेसर साहब को समझाया पर वे अपनी जिद पर अड़े रहे। किरपावा को पोरफेसर साहव के हर गतिविधि को भांपने के लिए पुरुब टोला से छोड़ा गया है, सरसोती पूजा के तीन दिन फूल का जुगाड़ हो जाए।
इस बार गाँव में दो जगह डीजे आया है और खुशी की बात है कि बसंत ऋतु का आगमन आज से ही होने वाला है । ऋतुओ में बसन्त सबसे प्रिय हर आदमी को लगता है और भगवान श्रीकृष्ण को भी । फूलों के बगीचों से निकल रही खुशबू वातावरण को सुहासित और आनंदित कर देती है तो दुसरी तरफ कोयल की कुक की ध्वनि कानों में पड़ती है तो गणेशवा का लीला देखते बनता है ।
कोयल कु बोलती है तो वो भी कु बोलता है ।
फिर दुबारा कु बोलती है वो भी पुनः बोलता है इस प्रतिस्पर्धा में दोनों अपने अपने जिद पर अड़े रहते है कि मै चुप नहीं रहूंगी तो गणेशवा भी । क्या गजब का समन्वय है एक दूसरे की ....
वर दे वीणा, वादिनी वर दे
हमें भी कुछ लिखने का श्रय दे । 
आप सभी दोस्तों को बसंत पञ्चमी, सरस्वती पूजा की हार्दिक बधाई ।

Sunday, 14 January 2018

काश गर मैं बेटा होती !

काश गर मैं बेटा होती!

माँ के सर  बोझ ना होती
पापा का सरदर्द ना होती
चैन- सुकुन से रह सकती
ये दुनिया ताने ना दे पाती।।
काश गर मैं बेटा होती !
मेरी माँ को ना झुकना पड़ता
डरके समाज में ना जीना होता
उन्मुक्त,आजाद परिंदे सी मैं भी
हर चाहत को पूरा कर पाती ।।
काश गर मैं बेटा होती!
कोई चाल चले या जाल बुने
ये साजिश भी ना सह पाती
माँ सहमी-सहमी रह जाती है
होठों से कुछ ना कह पाती है।।
काश गर मैं बेटा होती,
नित आंखो से नूर बहाती है
सबके ताने सुन रह जाती है
ये जख्म उसे भी न मिलता
उसको भी तो आदर मिलता।।
वो भी गर्व से रह पाती, काश अगर मैं बेटा होती!

कालिंदी पाठक

Saturday, 13 January 2018

एक संकल्प, विकल्प नही ।

अब समय नही संताप करने का
और दुश्मन को समझाने का
चलो उठो, संकल्प करो बस
कातिलो को सबक सिखाने का ।।

आलाप व्याप्त और चिर प्रतीत की
न ध्वनि को कर्ण तक जाने का
अब समय नही संताप करने का
और जाहिलों को समझाने का  ।।

है विकल, वियोग, विध्वंस यहाँ
माँ बनती रण में चंडी जब यहाँ
दुर्गाकाली व लक्ष्मीबाई बन के
करती है  यह पावन पुण्य धरा ।।

चुप रहने में  हानि है निज का
होगा कलिकाल,रक्तबीज वहाँ
अब समय नही संताप करने का
और दुश्मनो को समझाने का ।।

कर अटल निश्चय और लेके प्रण
उन शहीदों की आग बुझाने का
अब समय नही संताप करने का
और गीदड़ों  को समझाने का ।।

:- सुजीत कुमार पाण्डेय

Friday, 5 January 2018

कुटाई की यादें 🤛🤜🤛🤜👊👊

शिक्षा ही देश को महान बनाती है । हमारा देश भी  शिक्षा के क्षेत्र में पीछे नहीं है । अगर बड़े लोगो की बात की जाय जिसके पास काली कमाई का अंबार है या फिर धनाढय है,  अपने बच्चों को इंटरनेशनल स्कूलों में ही दाखिल दिलाते है। अपने देश में भी इन इंटरनैशनल स्कूलों की तरह स्कूल मौजूद है जैसे रेयान, ahelcon, कम्ब्रिज, दिल्ली international स्कूल, RBS, इत्यादि ।

हमारे जवार मे भी लगभग हर दस से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर कैम्ब्रिज, सरस्वती विद्या मंदिर,  वुडस्टॉक,  बिहार पब्लिक और बहुत सारे इंग्लिस मीडियम के स्कूल खुल गए है।  सबके पढ़ाई कराने के अलग-अलग पाठ्यक्रम, अलग-अलग ड्रेस, अलग- अलग बैच और अलग-अलग फीस  है । भले ही इन स्कूलों में पढ़ाई हिन्दी मीडियम से होती हो लेकिन स्कूल का नाम इंग्लिश में रखा जाता है ।
अरे भाई, स्कूल भी क्यों नही खुले । मुखिया जी लोगों ने जिसको चाहा ज्वाइनिंग लेटर थमा दिया । असली मेरिट वाले लोगों को नौकरी दूज के चाँद की तरह है । सच कहते है कि आजकल भगवान से भेंट करना आसान है लेकिन सरकारी नौकरी लेना मुश्किल काम है ।सरकार को एक भरती पूरा होने में आधे दशक निकल जाते है । खुदा ही जाने, कितने मुसीबतों को पार कर जाने के बाद भी अंत मे मेरिट तक पहुँचते पहुँचते खाली हाथ लौटना पड़ता है तब तक उम्र की समय सीमा सरहद पार कर चुकी होती है और अंत में जीविकोपार्जन के लिए  कही कुछ सहारा बनता है तो कही कोई प्राइवेट स्कूल या तो कही प्राइवेट कंपनियों के दरवाजे ..
वैसे बेरोजगारी की समस्या देश मे ही नही विदेशों में भी खूब है। आज हमारे देश को बाकी विकसित देश भी सलामी इसलिये ही तो ठोकते है क्योंकि हम सबसे बड़े आयातक है चाहे खाद्य पदार्थों की ले या सैन्य उपकरणों की, चाहे चिकित्सा जगत हो या इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र । अपने पर देश की बात की जाय तो सबसे ज्यादा उच्चतर श्रेणी में अपना स्थान आता है । अपने यहाँ से लोगों का पलायन बहुत ज्यादा है। अगर अपने ही राज्य में लोगों को काम मिल जाये, सरकार कम्पनियाँ लाये तो रोजगार मिल जाये ।
मैं तो भूल ही गया था, स्कूल की बात । हमारा भी बचपन कुछ ऐसे ही स्कूलों में बीता, इतने सारे गली गली में शिक्षा केन्द्र नही थे ।
प्राथमिक विद्यालय के बाद आगे की पढ़ाई प्रखंड के सरकारी स्कूल में हुई । क्या बताऊँ कितना मजा था । क्या गजब के दोस्त थे। एक अजब सी दास्तां है स्कूलों की ..खैर अब तो बात ही कुछ अलग है । मुझे लगता है कि स्कूलों में जितना कुटाई का महत्व है उतना दुनिया मे किसी चीज में नही। लेकिन अब कुटाई में बहुत हद तक कमी हो गई है इसी का प्रतिफल है कि आजकल के छात्र को गुरु के प्रति न कोई श्रद्धाभक्ति, त्याग और सहनशक्ति है और गुरुजनों को भी वो सदभाव, प्रेम और स्नेह ।
हमारी पढ़ाई थी, घर से पढ़ाई करने के बहाने निकल जाना और गाँव से 3 किलोमीटर दूर जाकर क्रिकेट मैच खेलना । हर दूसरे दिन मैच लेने का सिलसिला बरकरार रहता।  टीम कैप्टन की भी खूब मनमानी चलती। कुछ चाटुकार दोस्तों को टीम में पक्का जगह मिलती तो कुछ ऐसे भी दोस्तो की सीट सही सलामत रहती जिसके पास  "टाइगर जिंदा रहता" मतलब टाइगर बिस्कुट की बाजी में पैसा लगाने में अहम योगदान रहता । जो पैसा नही देता उसे टीम से बाहर निकल दिया जाता और चेहरे पर लाइट गुम होने पर टीम कैप्टन की मेहरबानी से वापसी होती ।
लट्टू में भी साइन करना आप लोग तो शायद भूल ही चुके होंगे । साइन होता है लट्टू की डोरी से लपेट कर जैसे लट्टू नाचने लगे डोरी के सहारे लपेटकर पुनः हाथ मे ले लेना। कई बार लट्टू में गुज (एक कील जो लट्टू के बीच मे लगाया जाता है) के लिए रामचंदू लोहार के पास घंटो लग जाते ।
स्कूल की पहला आधा सत्र ठीक तरह से निकल जाता, वजह था विषय मे हिंदी, सामाजिक विज्ञान, सामान्य विज्ञान का होना पर जैसे ही पहर गुजरता मानो हमारे लिए पूरे 2 घंटी निकलना बड़ा मुश्किल होता । अंग्रेजी तो किसी तरह से निकल जाती पर संस्कृत और मैथ से पीछा छुड़ाना मुश्किल ही नही नामुमकिन था। मैथ्स में कुटाई, अंग्रेजी खाली निकल जाती पर संस्कृत कालजली मुँह फाड़ कर आती और न जाने कितनों पर नागवार गुजरती कहना संभवतः कठिन था ।
ये दोनों कहावते खुलकर सामने घर कर जाती है ।
इकरा में कौनो पहाड़ा पढ़े के बा ।
ई काम करे में का मंतर पढ़े के है।
खुदा कसम, पूरा पढ़ाई का उम्र निकल गया पर अभी भी 18 और 19 के पहाड़े में गाड़ी अटक जाती है । शुरू का पाँच और अंतिम का एक 3 नंबर गियर में निकल जाता है पर अंतिम के बाकी चार एक नंबर गियर में भी गाड़ी फस जाती है । अब मालूम चला कि पहाड़ा याद करना कितना कठिन काम है और दूसरा मंतर पढ़ना उससे भी ज्यादा कठिन काम है । उन गुरुओं को आज भी नमन करता हूँ जिन्होंने बड़े बड़े संस्कृत पाठों को कंठस्थ किया है । 10 श्लोक याद करने में महीनों लग जाते फिर भी कुछ न कुछ खामियां रह जाती थी ।
मुझे याद है हमारे गुरु राय जी"  लता शब्द रूप याद करने के लिए दिए थे पर ठीक से याद नही हुआ था । अगले दिन खूब जोर से कुटाई हुई थी, तब रात के स्वप्न में भी लता याद आ जाती । पूरे क्लास में एकाध लड़के थे जो श्लोक याद करने में माहिर थे और राय जी से यदा कदा ही एक दो छड़ी खाते थे बाकी पूरे क्लास की कुटाई होना लाजिमी था, हम में से कुछ दोस्तो को संस्कृत ने पढ़ाई ही छोडवा के दम लिया ।
दो कविता को सुन सुनकर घर वालो के भी कान पक चुके थे,
पहला :- हवा हूँ हवा हुँ बसंती हवा हुँ
दूसरा :-  खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।
मुझे आज भी पूरी तरह से याद है जब रात में छत पर लालटेन जलाकर पढ़ते और पढ़ाई में मन नही लगता तो आँख बंद कर यही जोर जोर से शुरू हो जाता ।  माँ कभी कभी बोलने लगती । क्या तुम्हारे बुक में एक ही कविता है जो रोज रोज सुनाते रहते है, चोरी छिपाने के लिए कहना पड़ता की कल सरजी को यही कविता सुनाना है न ।
स्कूल जाने के लिए पैसे की जिद करना भी कहाँ अभी तक भूले है । पूरी की पूरी राम कहानी अभी पूरी तरह से याद है एक रुपये में दो प्लेट चाट में जो मजा था उसका स्वादिष्ट आज के बड़े बड़े रेस्टोरेंट में भी फीका है ।
कुछ बड़े हुए आगे की स्कूलों में दाखिला लिए और कुटाई की संभावनाएं कम होने लगी । अब तो धीरे धीरे आजाद, उन्मुक्त पंछी बन गए पर अब कोई समझाने बताने या कूटने वाला नही रहा जिसकी कमी स्वत् महसूस होने लगी थी ।
आज मैं उन गुरुओं को सादर नमन करता हुँ जिन्होंने मुझे कूट कूटकर यहाँ पहुँचाया और अभी तक बरबस याद आते रहते है ।

Thursday, 4 January 2018

माँ यमुना साक्षात्कार- दिल्ली भाग 1

​ठिठुरती ठंड में रजाई से निकल कर संध्या की बेला में  यमुना के किनारे पहुँचा  ........ निगम बोध उत्तरी दिल्ली श्मशान स्थल ...; जहाँ पर लोग अपनी जीवन लीला अस्त कर अस्थि रूप लेकर सदा के लिए स्थिर हो जाते है । 

बड़ा ही अजीब दृश्य था । लोगों का मेला लगा हुआ था । एक के बाद एक आने जाने वालों की लगातार संख्या लगभग हजारो में थी । हालाँकि पुरुषों की तुलना में स्त्तियाँ कम थी । आने जाने वालों के मुँह से एक ही वाक्य निकल रहे थे । 


"राम नाम सत्य है"


और मुख्य द्वार पर ही लिखा था ।


"मुझे यहां तक पहुचाने के लिए शुक्रिया, इसके आगे हम अकेले ही चल जाएंगे"


वाकई बड़े से बड़े हस्ती वाले जिन्होंने महल और अटारी बना रखे हो या जिंदगी की सारी सुख-सुविधा मिल चुकी हो उनके परिजन मुख्य दरवाजों तक ही अपने मर्सिडीज कार ले आने की अनुमति है या फिर दूसरा जो चौक-चौराहों पर भीख मांग कर जीवन बिताया हो, दोनो के जीवन की लीला यही समाप्त होती है । राजा और रंक दोनो के लिए यहाँ कोई भेदभाव नही है। यहाँ जो भी आता है उसके घमंड और शौर्य की साहस चकनाचूर हो जाती । 


घाट पर कुत्ते, कौवे और बगुले मांस के लिए अपनी अपनी आस लगाए बैठे थे । क्षुधा तृप्ति के लिए लालायित को यदा कदा दो चार लठ खाना भी पड़ जाता था ।



यमुना घाट पहुँचने पर वहाँ बैठने के लिए बहुत सारे पत्थर के बेंच बनाया गया है, कुछ घंटे  गुजरने के बाद ठंड कुछ ज़्यादा ही लगने लगा । कुछ दूरी पर चार पाँच लोग अलाव जलाकर बैठे थे ।  माँ यमुना लहरों से बह रही ठण्डी हवाओं से ठंड ऐसा लग रहा था जैसे हवाओं का मिलन हड्डियों से हो रहा हो  । शाम के बाद अंधेरा होने लगा और शरीर मे आलस होने सोचते विचारते हुए ही न जाने कब नींद लग गई । जब आँखे खुली तो खुद को अकेला यमुना के तीर पाकर सहम गया । काफी देर सोचने के बाद भी यह वहम हो रहा था कि पूर्णमासी की चाँदनी रात में मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ।


पीछे की तरफ पांडवो के द्वारा बसाया गया विशाल नगर राजधानी इंद्रप्रस्थ की विशालता से अभिभूत होकर मुझे इस नगर के बारे में न जाने कहाँ से सोच आई । 


शीतल कलकल करती हुई माँ यमुना के सदृश्य हो ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरे मन मे उठे सवालों का जबाब यहाँ  मिल सकता है । तबतक यमुना नदी से बढ़ती आ रही धाराओं ने मुझे खुद में समाहित कर लिया । 

यह मेरे लिए एक अलग ही दुनिया से रुबरु करा रही थी। बैठे बैठे मुझे एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया  जिसपर नजर टिका पाना मुश्किल लग रहा था ।


दिव्य स्रोत से आ रही किरणों को देखकर मैं काफी डर गया ..और आस पास नजर दौड़ाया तो खुद को अकेला पा प्राण पखेरू उड़ गए ।


दिव्य पुंज से आवाज आई  ... 


डरो मत । ......................... वत्स ।


मैं   ...........कालिंदी हुँ।


मैं सूर्यपुत्री हुँ और मृत्यु के देवता यम की बहन हुँ । कृष्ण के ब्रज में "जमुना मैया" के नाम से जानी जाती हूँ । मैं  (कलिंद दुर्गम पर्वत से होकर यमुनोत्री के बंदरपूछ से होकर बहती हु) द्वापर युग से अब तक यहाँ बहती आई हूँ और नगर के लोगों के हर वक्त कल्याण की कामना करती हूँ । तुम्हारी उदासी को देख नही रहा गया । 


बोलो किस लिए चिंतित हो ? तुम्हे डरने की कोई जरूरत नही है ।

मैने दोनों हाथों को जोड़कर प्रणाम किया और सहज भाव से बोल पड़ा। 

लहरों ने एक बार फिर से ऊपर उठकर मेरे पास आकर रुक गया । फिर आवाज आई ।

मैं - माते, आप गंगा मईया की तरह गोरी क्यों नही हो, आपका रंग स्यामल क्यों है ?

यमुना :-  पुत्र, मेरे पिता भगवान सूर्य है जो मेरी माँ छाया है । मेरी माँ श्यामल रंग की थी इन्ही का प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा, इसलिये मैं श्यामल हूँ ।

मैं - माते मुझे इस नगर के बारे में विस्तृत जानकारी लेना चाहता हूँ । इतना कहते ही धाराओं की लहर ने मुझे तेज़ गति से बहती हुई आकर मुझे अपने आगोश में ले लिया और मेरी आँखों के सामने प्रकाश पुंज से एक स्यामल गौर स्त्री स्वरूप माँ का साक्षात दर्शन हुआ और मीठे स्वरों में बोली  ।

यमुना - पुत्र, मैं तुम्हारी सभी जिज्ञासाओं को पूरा करूँगी ।


मैं - जी, माते 


आगे की कहानी के लिए कृपया वक़्त लगेगा ।


Sunday, 17 December 2017

चाय की चर्चा ☕☕

यूं कहें तो बड़ी लजीज चीज है, सुबह दिन की शुरुआत हो या काम की शुरुआत या फिर चाहे आगंतुक सत्कार ।। दूसरे शब्दों में इसे

निद्रानास्ति
स्फुर्तिदात्री
टाइमपासिनी
सरदर्दनिवारिणी

के साथ साथ ठंडहारिणी भी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी । जी हाँ, अब आप तो अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि आज मैं आपसे चाय पर चर्चा करने वाला हुँ । आज देश के लगभग हर परिवार में दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। आप भी इससे अछूता नही होंगे । चाय की अनेक किस्में है जैसे लेमन टी, ग्रीन टी, मसालेदार टी, कॉफी मिश्रित टी, और अन्य । बचपन से आज कल बच्चों को चाय दे दिया जाता है और बाद में बच्चों की जिद्द भी हो जाती है । वजह यह है कि दूसरे की देखा देखी में बच्चे भी चाय के शौक पाल लेते है। मैं भी पीछे कहाँ रहने वाला था । चाय का आशिक बन बैठा था पर पीने की नही बल्कि दिन की शुरूआत चाय के साथ रोटी को गोल लपेट कर चाय रोटी खाने की ।

"" कुछ साल गुजरे । क्लास 8 में पहुँचा तब तक बिना रोटी के साथ चाय लिया नही था । इसी बीच दीदी की शादी हुई और शादी के दो दिन बाद ससुराल पहुँचा । आमतौर पर जैसे की समाज मे रिवाज चलता है । मीठा पानी के बाद चाय आया । पहले तो चाय लेने से मैने मना कर दिया पर साथ मे बैठे कुछ लोग हँसने लगे और मजाकिया अंदाज में बोल बैठे । पी लो जीजा शौख से लाये है । चाय तो ले लिया और बगल में रख दिया । तब तक बगल के पड़ोसी कहने लगे, लगता है लड़का शर्मा रहा है । अन्ततः चाय जैसे ही ओठ तक पहुँचाया, जीभ जल गई और यह देख बैठे सभी लोग जोर जोर से हँसने लगे।""

आज कल चाय का क्रेज इतना बढ़ चुका है कि महज चाय के कारोबार से लोग लाखों करोड़ों में खेलने लगे । आज के दौर में एक अच्छी नौकरी वालो से भी ज्यादा इनकम एक चाय वाले की है । लगभग हर शहर में आपको वहाँ के मशहूर चाय की दुकान मिल जाएगी जिसमें चाय लेने के लिए 5-10 मिनट का इंतज़ार करना पड़ता होगा । आज के दौर में सस्ता और यादगार पार्टी करनी हो तो सबसे बेहतरीन जरिया है चाय पार्टी (टी-पार्टी) । ऐसी पार्टी के लिए हर कोई तैयार हो जाता है और खुशी खुशी से रजामंद होकर दोस्त शरीक हो जाते है । पटना में मशहूर चाय का दुकान आज भी याद है जिसके लिए राहुल, रवि के साथ सुबह सुबह निकल जाते थे । क्या गजब की चाय बनाता था वह बंदा कड़क और अजब गजब आज भी मेरे नजर में उसके लिए तारीफ भरा पड़ा है ।

अगर आप राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रह रहे है तो एक बार निर्माण भवन के पास पवन का मशहूर चाय पी सकते है । सुबह से ही चाय पीने वाले लोगो की कतार लगी रहती है । कल बटर वाली चाय का सुरूर चढ़ा और अपने एक साथी से जामा मस्जिद के गेट 01 पर चाय की दुकान के बारे में सुना था इसलिए निकल पड़ा सुबह सुबह..... मंजिल चाय तक के लिए निकाला और सड़कों की उलटफेर में गंतव्य तक पहुँचने में काफी देर हो गई और ईश्वर को मंजूर नही था कि यहाँ का इच्छित चाय पी सके । आननफानन में दोस्त को फ़ोन लगाया तो उसका मोबाइल स्विच बन्द पाया । गली में तो बहुत सारी दुकाने थी पर वो दुकान नही मिल पाई। अन्ततः गली में ही एक दुकान पर चाय पिया लेकिन चाय पीने से ही ऐसा एहसास हो रहा था कि हम गलत दुकान पर है, हालांकि चाय अच्छा था। पर क्या आप चाय से होने वाले बीमारियों से वाकिफ है ?

अगर नही तो आज मैं इसके दुष्परिणाम का वर्णन करने जा रहा हूँ । जिस चाय को हम इतना बखान किये है वह भी एक प्रकार का नशा है जो हमारे स्वस्थ शरीर में दर्जनों रोगों को आमंत्रण करता हैं । चाय पीने से याददाश्त कमजोर होने लगती है । लीवर से संबंधित रोग होने की प्रबल संभावना रहती है कैंसर और अनिद्रा रोग सक्रिय हो जाते है । चीनी के सेवन से मधुमेह होना लाजिमी है और शरीर का वजन की बढ़ने लगता है ।कैफीन होने की वजह से शरीर के सक्रिय सेलों में आलस पैदा करता है और कमजोर बनाता है । सेक्स से संबंधित जैसे वीर्य को पतला करता है और नपुंसकता आदि को बढ़ावा देता है । अक्सर दुकानों पर अल्युमिनियम के बर्तनों में बने चाय से अलमुनियम निकलकर शरीर को प्रभावित करता है साथ ही दुकानदार एक ही चायपत्ती को बारी बारी से यूज करता है जो बेहद ही खतरनाक होता है । दुनिया में कहने समझाने वालो की कोई कमी नही है पर जरूरी है कितने लोग इसे अमल में लाते है और कितने नही ।