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ख्याति इसकी गजब नाम की।
समाज का मान-मरजाद है।
भोजपुरिहा का उपहार हैं ।
सुखद, सहज और लायक हैं ।
फुरती, साहस और जुनून भरती हैं ।
सोचो इसकी कितनी अहमियत हैं ।
बोझ बाँधने में भी एकदम लायक हैं ।
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sujit1992.blogspot.com
#एक_यात्रा_ऐसा_भी
आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो से जाने का नहीं था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।
बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते, चलना है क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!
मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।
हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।
रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?
अवाक हुआ इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।
याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?
दिये निकाला रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।
वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।
#एक_यात्रा_ऐसा_भी
आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो से जाने का नहीं था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।
बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते, चलना है क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!
मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।
हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।
रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?
अवाक हुआ इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।
याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?
दिये निकाला रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।
वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।
वक़्त के पन्ने पलटे तो अचानक ख्याल आया
खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ?
बहुत देर लगी खुद को समेटते समेटते
यादों की रेत हवा में ठहर कैसे गई ?
तन्हाइयों के कफन में बंधा है ये जिस्म
मैं तो मिट्टी नही थीं, बिखर कैसे गई ?
हर पल कतरा कतरा मारा था जिसे उम्र भर
अपनी वो लाश पहचानने से आज मुकर कैसे गई ?
बेदम बेजान आरजूओं के जनाजे देखे थे कई
अपनी ही कब्र देखी तो सिहर कैसे गई ?
खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ??
----- पूर्वा अग्रवाल
अब समय नही संताप करने का
और दुश्मन को समझाने का
चलो उठो, संकल्प करो बस
कातिलो को सबक सिखाने का ।।
आलाप व्याप्त और चिर प्रतीत की
न ध्वनि को कर्ण तक जाने का
अब समय नही संताप करने का
और जाहिलों को समझाने का ।।
है विकल, वियोग, विध्वंस यहाँ
माँ बनती रण में चंडी जब यहाँ
दुर्गाकाली व लक्ष्मीबाई बन के
करती है यह पावन पुण्य धरा ।।
चुप रहने में हानि है निज का
होगा कलिकाल,रक्तबीज वहाँ
अब समय नही संताप करने का
और दुश्मनो को समझाने का ।।
कर अटल निश्चय और लेके प्रण
उन शहीदों की आग बुझाने का
अब समय नही संताप करने का
और गीदड़ों को समझाने का ।।
:- सुजीत कुमार पाण्डेय
ठिठुरती ठंड में रजाई से निकल कर संध्या की बेला में यमुना के किनारे पहुँचा ........ निगम बोध उत्तरी दिल्ली श्मशान स्थल ...; जहाँ पर लोग अपनी जीवन लीला अस्त कर अस्थि रूप लेकर सदा के लिए स्थिर हो जाते है ।
बड़ा ही अजीब दृश्य था । लोगों का मेला लगा हुआ था । एक के बाद एक आने जाने वालों की लगातार संख्या लगभग हजारो में थी । हालाँकि पुरुषों की तुलना में स्त्तियाँ कम थी । आने जाने वालों के मुँह से एक ही वाक्य निकल रहे थे ।
"राम नाम सत्य है"
और मुख्य द्वार पर ही लिखा था ।
"मुझे यहां तक पहुचाने के लिए शुक्रिया, इसके आगे हम अकेले ही चल जाएंगे"
वाकई बड़े से बड़े हस्ती वाले जिन्होंने महल और अटारी बना रखे हो या जिंदगी की सारी सुख-सुविधा मिल चुकी हो उनके परिजन मुख्य दरवाजों तक ही अपने मर्सिडीज कार ले आने की अनुमति है या फिर दूसरा जो चौक-चौराहों पर भीख मांग कर जीवन बिताया हो, दोनो के जीवन की लीला यही समाप्त होती है । राजा और रंक दोनो के लिए यहाँ कोई भेदभाव नही है। यहाँ जो भी आता है उसके घमंड और शौर्य की साहस चकनाचूर हो जाती ।
घाट पर कुत्ते, कौवे और बगुले मांस के लिए अपनी अपनी आस लगाए बैठे थे । क्षुधा तृप्ति के लिए लालायित को यदा कदा दो चार लठ खाना भी पड़ जाता था ।

यमुना घाट पहुँचने पर वहाँ बैठने के लिए बहुत सारे पत्थर के बेंच बनाया गया है, कुछ घंटे गुजरने के बाद ठंड कुछ ज़्यादा ही लगने लगा । कुछ दूरी पर चार पाँच लोग अलाव जलाकर बैठे थे । माँ यमुना लहरों से बह रही ठण्डी हवाओं से ठंड ऐसा लग रहा था जैसे हवाओं का मिलन हड्डियों से हो रहा हो । शाम के बाद अंधेरा होने लगा और शरीर मे आलस होने सोचते विचारते हुए ही न जाने कब नींद लग गई । जब आँखे खुली तो खुद को अकेला यमुना के तीर पाकर सहम गया । काफी देर सोचने के बाद भी यह वहम हो रहा था कि पूर्णमासी की चाँदनी रात में मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ।
पीछे की तरफ पांडवो के द्वारा बसाया गया विशाल नगर राजधानी इंद्रप्रस्थ की विशालता से अभिभूत होकर मुझे इस नगर के बारे में न जाने कहाँ से सोच आई ।
शीतल कलकल करती हुई माँ यमुना के सदृश्य हो ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरे मन मे उठे सवालों का जबाब यहाँ मिल सकता है । तबतक यमुना नदी से बढ़ती आ रही धाराओं ने मुझे खुद में समाहित कर लिया ।
यह मेरे लिए एक अलग ही दुनिया से रुबरु करा रही थी। बैठे बैठे मुझे एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया जिसपर नजर टिका पाना मुश्किल लग रहा था ।
दिव्य स्रोत से आ रही किरणों को देखकर मैं काफी डर गया ..और आस पास नजर दौड़ाया तो खुद को अकेला पा प्राण पखेरू उड़ गए ।
दिव्य पुंज से आवाज आई ...
डरो मत । ......................... वत्स ।
मैं ...........कालिंदी हुँ।
मैं सूर्यपुत्री हुँ और मृत्यु के देवता यम की बहन हुँ । कृष्ण के ब्रज में "जमुना मैया" के नाम से जानी जाती हूँ । मैं (कलिंद दुर्गम पर्वत से होकर यमुनोत्री के बंदरपूछ से होकर बहती हु) द्वापर युग से अब तक यहाँ बहती आई हूँ और नगर के लोगों के हर वक्त कल्याण की कामना करती हूँ । तुम्हारी उदासी को देख नही रहा गया ।
बोलो किस लिए चिंतित हो ? तुम्हे डरने की कोई जरूरत नही है ।
मैने दोनों हाथों को जोड़कर प्रणाम किया और सहज भाव से बोल पड़ा।
लहरों ने एक बार फिर से ऊपर उठकर मेरे पास आकर रुक गया । फिर आवाज आई ।
मैं - माते, आप गंगा मईया की तरह गोरी क्यों नही हो, आपका रंग स्यामल क्यों है ?
यमुना :- पुत्र, मेरे पिता भगवान सूर्य है जो मेरी माँ छाया है । मेरी माँ श्यामल रंग की थी इन्ही का प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा, इसलिये मैं श्यामल हूँ ।
मैं - माते मुझे इस नगर के बारे में विस्तृत जानकारी लेना चाहता हूँ । इतना कहते ही धाराओं की लहर ने मुझे तेज़ गति से बहती हुई आकर मुझे अपने आगोश में ले लिया और मेरी आँखों के सामने प्रकाश पुंज से एक स्यामल गौर स्त्री स्वरूप माँ का साक्षात दर्शन हुआ और मीठे स्वरों में बोली ।
यमुना - पुत्र, मैं तुम्हारी सभी जिज्ञासाओं को पूरा करूँगी ।
मैं - जी, माते
आगे की कहानी के लिए कृपया वक़्त लगेगा ।
यूं कहें तो बड़ी लजीज चीज है, सुबह दिन की शुरुआत हो या काम की शुरुआत या फिर चाहे आगंतुक सत्कार ।। दूसरे शब्दों में इसे
निद्रानास्ति
स्फुर्तिदात्री
टाइमपासिनी
सरदर्दनिवारिणी
के साथ साथ ठंडहारिणी भी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी । जी हाँ, अब आप तो अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि आज मैं आपसे चाय पर चर्चा करने वाला हुँ । आज देश के लगभग हर परिवार में दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। आप भी इससे अछूता नही होंगे । चाय की अनेक किस्में है जैसे लेमन टी, ग्रीन टी, मसालेदार टी, कॉफी मिश्रित टी, और अन्य । बचपन से आज कल बच्चों को चाय दे दिया जाता है और बाद में बच्चों की जिद्द भी हो जाती है । वजह यह है कि दूसरे की देखा देखी में बच्चे भी चाय के शौक पाल लेते है। मैं भी पीछे कहाँ रहने वाला था । चाय का आशिक बन बैठा था पर पीने की नही बल्कि दिन की शुरूआत चाय के साथ रोटी को गोल लपेट कर चाय रोटी खाने की ।
"" कुछ साल गुजरे । क्लास 8 में पहुँचा तब तक बिना रोटी के साथ चाय लिया नही था । इसी बीच दीदी की शादी हुई और शादी के दो दिन बाद ससुराल पहुँचा । आमतौर पर जैसे की समाज मे रिवाज चलता है । मीठा पानी के बाद चाय आया । पहले तो चाय लेने से मैने मना कर दिया पर साथ मे बैठे कुछ लोग हँसने लगे और मजाकिया अंदाज में बोल बैठे । पी लो जीजा शौख से लाये है । चाय तो ले लिया और बगल में रख दिया । तब तक बगल के पड़ोसी कहने लगे, लगता है लड़का शर्मा रहा है । अन्ततः चाय जैसे ही ओठ तक पहुँचाया, जीभ जल गई और यह देख बैठे सभी लोग जोर जोर से हँसने लगे।""
आज कल चाय का क्रेज इतना बढ़ चुका है कि महज चाय के कारोबार से लोग लाखों करोड़ों में खेलने लगे । आज के दौर में एक अच्छी नौकरी वालो से भी ज्यादा इनकम एक चाय वाले की है । लगभग हर शहर में आपको वहाँ के मशहूर चाय की दुकान मिल जाएगी जिसमें चाय लेने के लिए 5-10 मिनट का इंतज़ार करना पड़ता होगा । आज के दौर में सस्ता और यादगार पार्टी करनी हो तो सबसे बेहतरीन जरिया है चाय पार्टी (टी-पार्टी) । ऐसी पार्टी के लिए हर कोई तैयार हो जाता है और खुशी खुशी से रजामंद होकर दोस्त शरीक हो जाते है । पटना में मशहूर चाय का दुकान आज भी याद है जिसके लिए राहुल, रवि के साथ सुबह सुबह निकल जाते थे । क्या गजब की चाय बनाता था वह बंदा कड़क और अजब गजब आज भी मेरे नजर में उसके लिए तारीफ भरा पड़ा है ।
अगर आप राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रह रहे है तो एक बार निर्माण भवन के पास पवन का मशहूर चाय पी सकते है । सुबह से ही चाय पीने वाले लोगो की कतार लगी रहती है । कल बटर वाली चाय का सुरूर चढ़ा और अपने एक साथी से जामा मस्जिद के गेट 01 पर चाय की दुकान के बारे में सुना था इसलिए निकल पड़ा सुबह सुबह..... मंजिल चाय तक के लिए निकाला और सड़कों की उलटफेर में गंतव्य तक पहुँचने में काफी देर हो गई और ईश्वर को मंजूर नही था कि यहाँ का इच्छित चाय पी सके । आननफानन में दोस्त को फ़ोन लगाया तो उसका मोबाइल स्विच बन्द पाया । गली में तो बहुत सारी दुकाने थी पर वो दुकान नही मिल पाई। अन्ततः गली में ही एक दुकान पर चाय पिया लेकिन चाय पीने से ही ऐसा एहसास हो रहा था कि हम गलत दुकान पर है, हालांकि चाय अच्छा था। पर क्या आप चाय से होने वाले बीमारियों से वाकिफ है ?
अगर नही तो आज मैं इसके दुष्परिणाम का वर्णन करने जा रहा हूँ । जिस चाय को हम इतना बखान किये है वह भी एक प्रकार का नशा है जो हमारे स्वस्थ शरीर में दर्जनों रोगों को आमंत्रण करता हैं । चाय पीने से याददाश्त कमजोर होने लगती है । लीवर से संबंधित रोग होने की प्रबल संभावना रहती है कैंसर और अनिद्रा रोग सक्रिय हो जाते है । चीनी के सेवन से मधुमेह होना लाजिमी है और शरीर का वजन की बढ़ने लगता है ।कैफीन होने की वजह से शरीर के सक्रिय सेलों में आलस पैदा करता है और कमजोर बनाता है । सेक्स से संबंधित जैसे वीर्य को पतला करता है और नपुंसकता आदि को बढ़ावा देता है । अक्सर दुकानों पर अल्युमिनियम के बर्तनों में बने चाय से अलमुनियम निकलकर शरीर को प्रभावित करता है साथ ही दुकानदार एक ही चायपत्ती को बारी बारी से यूज करता है जो बेहद ही खतरनाक होता है । दुनिया में कहने समझाने वालो की कोई कमी नही है पर जरूरी है कितने लोग इसे अमल में लाते है और कितने नही ।