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Tuesday, 18 June 2019

मुजफ्फरपुर

क के माँग हर जगह उठावे वाला बिहार में तवाँ जाला,
हरदम चिचियात रहे गरीबन खातिर, ऊहो मुँह लुकवा जाला
हं, बिहारियो बिहारी के दुख अब भुला जाला।

देस-बिदेस में बसल बाड़ें बड़हन नेता, अभिनेता आ पत्रकार
बाकी अब त राजनीति करे में लोग अझुरा जाला।
हं, बिहारियो बिहारी के दुख अब भुला जाला।

लाश जतने छोट आवे, तन-मन के ओतने झकझोरेला
बेबस माई-बाप, परिवार के करेजा चरचरा जाला
हं, बिहारियो बिहारी के दुख अब भुला जाला।

बहरी के एगो छोटो घटना, टीबी के बड़ खबर बनेला
बिदेसो से हरसंभव मदत, सांत्वना आ सलाह आ जाला
हं, बिहारियो बिहारी के दुख अब भुला जाला।

फिकिर में के बा, बाढ़ में हर साल दहत बिहार बा
बिकास पुरुस कागजी, गरीबी-पलायन प चुपा जाला
हं, बिहारियो बिहारी के दुख अब भुला जाला।

बेमउअत मउअत के जबाबदेह के बा, गरीब के सँघाती-इयार के बा
जे आपन केहू बिछुड़े त असली दरद बुझा जाला
हं, बिहारियो बिहारी के दुख अब भुला जाला।

रोज टीबी प रोवत माई बाबू के आँखि देखी सुजीत के अँखिया लोरा जाला
कब ले होइ निदान इहे चाहे ला मनवा कसक जाला
हं, बिहारियो बिहारी के दुख अब भुला जाला।

:- सु जीत, बक्सर।

[विशेष अभार:- श्री कृष्णा जी पाण्डेय]

Monday, 5 November 2018

शुभ दिवाली

जा एगो दीया पुरनका घरे भी जरा दिहs.

सन्ध्या हो चली थी। समय लगभग साढ़े पांच बजने वाले थे। गावँ के ज्यादातर लड़के नहा-धोकर एक थाली में मिट्टी के सात-आठ दीये, घी से लिपटी हुई बाती और एक माचिस लिये तेजी से जा रहे थे। इन जाने वाले लड़को का गंतव्य था कोई गावँ के ब्रह्म बाबा, काली माई, डीहबाबा या शंकर भगवान का शिवाला।

माँ बार बार कह रही थी। लेट हमारे घर में ही होता हैं। सब लोग चल जायेगा तब तुम जाओगे। भगवान के पास दीया शाम को जलाया जाता हैं रात में नहीं। जल्दी जाओ देर हो चुका हैं।

फटाफट नहा धोकर एक थाली में कुछ दीये, बाती और एक माचिस लिए मैं भी निकला, चूंकि मुझे लगता हैं कि दीये जलाने वालों में से मेरा नाम अन्तिम दस लोगों में होगा।
जल्दीबाजी ऐसी थी कि चप्पल लगाना भी भूल गया था। ब्रह्मबाबा, बजरंग बली, शंकर भगवान के स्थान पर दीया जलाने के बाद पुराना घर की समीप जाते ही लौट गया अपने अब तक के चौदह पंद्रह साल पहले...

दिवाली का दिन था। पूरे गावँ में खुशी का माहौल था। सब अपने अपने छत पे चढ़कर पूरे दीवाल पर डिजाइन में मुम्बत्तीयाँ जलाने, फटाखे फोड़ने में मशगूल था। मेरे लिए भी भइया कुछ पटाखे लाये थे। पटाखों का वितरण सबके लिए किया गया।  मुझे जो भी मिला उसमें ज्यादातर छुरछुरी और एकादुक्का लाइटर और दो आकाशबाड़ी था।

"हम लड़को ने आपस में मिलकर छत पे एक छोटा सा दिवाली घर बना रखे थे। पहली बार मुझे एहसास हुआ था कि घर बनाना बहुत आसान काम हैं बस एक दो दिन में तो सबकुछ बन जाता हैं। दिवाली घर के छत पर  जाने की सीढ़ियां और उसके ऊपर एक पक्षी जिसको बनाने का श्रेय दीदी का था। घर की पेंटिंग और डिजाइन बनाने का काम बड़े भाई एवं मेरा काम था कुछ ईंटो, पीली मिट्टी, रंग, और समय समय पर बताये हुए काम को चपलता के साथ करना।"
उस बार की दिवाली  मेरे लिए दुखद सन्देश लाई थी। पटाखा छोड़ने के बाद पुनः छत से नीचे उतरके दो तीन पुड़ी सब्जी खाके दुबारा बचे हुए पटाखों को खत्म करने के लिए  छत पे गया।
इस बार का पटाखा थोड़ा ज्यादा खतरनाक था। जलाने के बाद बगल की गली में फेंकना चाह रहा था कि गली में न जाके बगल वाले पड़ोसी के फुस का भूसा रखने वाला  "खोंप" के ऊपर जा गिरा।
फिर क्या था मिनट भर की देरी में ही आग फैल गई और पूरे गाँव में आग आग हल्ला हो गया। जब एक छोटा भाई घर में बताया कि इसके कारण ही आग लगी हैं। पापा से मुझे खूब जम के धुलाई हुई और रोने की आवाज सुनकर जिनके यहाँ आग लगी थी आये और कहने लगे.
"बच्चे को मत मारिये आपलोग.. अनजान में गलती हो गई हैं उससे"
रोता हुआ मेरे मन में एक अलग ही आत्मीय सुखद आश्चर्य की अनुभूति हुई।
[ भले लोग के साथ हमेशा ही भला ही होता हैं। आज बेरोजगारी के दौर में उनके चार लड़को में तीन सरकारी जॉब में हैं]
मेरी तरफ से आप सभी को शुभ दीपावली

Tuesday, 10 April 2018

"कुछ यादगार लम्हें......की!!!

""कुछ यादगार लम्हें .........की!!!!""

मुझे अच्छी तरह से याद हैं!!..
जब मैं पहली बार तुमसे मिला था! वो दिन बजट-सत्र का आखिरी दिन था और मैं पहली बार दिल्ली की जमीं पर कदम रखा था।

ना दिल में चैन था और ना मन को सुकून! हर वक़्त याद कर कर के मन विचलित और रूह परेशान था।

भला याद करूँ भी क्यों नहीं?!!..
तुम मेरे रूह में इस कदर समा गई थी, हमबिस्तर बन के। तुम्हारी जरा सी भी आहत मुझे बेचैन कर देती थी और मैं खोजने लगता था विकल होके, और तुम कही छुप जाती थी और हाँ...!!
मिलती कहाँ थी, आसानी से ....

असल में तुम्हारा और मेरा खून का रिश्ता जो ठहरा।

तुम्हारे छोटे छोटे दाँतो की काटी हुई चुभन का तो मैं मुरीद हो गया था !!, जहाँ भी काटती,,,, वहाँ का दाग भी कितना भयानक होता और ऐसे दाग को लोगों से छुपाना पड़ता वरना मेरी खिल्ली उड़ जाती।

पता हैं एक बार घर जो गया था। तुम्हारे शातिर बदमाशी को देखकर घर वाले भी हैरान थे। लाल-लाल के चकते जो इतने खतरनाक दिख रहे थे। जो जख्म हरे थे वे दवा लगाने के बाद भी जल्दी से ठीक नहीं हुए।

ख़ैर अभी कुछ चैन हैं जबसे चारपाई बदली हुई हैं।

#""खटमल की याद में""#

Monday, 9 April 2018

!! रूह संवाद!!

कहते हैं!!"
वक़्त गतिमान हैं।
यह अटल और शाश्वत हैं।
बदलता वक़्त घावों को तो भर सकता हैं पर,
उनका क्या जो जलते हैं बिन बाती के ज़रा-जरा-सा।

उमड़ पड़ते हैं ख्वाबों तले
मचल उठते हैं उन लहरों-सा
जो एक मिलन की आस में
उछल पड़ती हैं उन आसमाँ की ओर....
पर होता नहीं नसीब। फिर क्यों?

निकल पड़ते हैं अश्क़,
तोड़ सारे बाँधो का किनारा,
उम्मीद ही न बनता हैं सहारा,
क्या यही होने का अहसास हैं,

झुठलाती हैं वो कहकर...

"नहीं तो !!"

शायद ये गलतफहमी हैं तुम्हारी।

हाँ!! , मैं भी ठहरा एक जिद्दी,
न रुकने वाला,न थकने वाला,
वक़्त जख्मों को भर सकता हैं
पर ज़रूरी नहीं हर मर्ज की दवा ही हो।

कुछ मर्ज की दवा खुद खुदा बनाता।

"बोला:- .....
सुनो!!

दावाग्नि में जले उपवन में पत्ते पल्लवित हो सकते हैं पर
मुखाग्नि के स्वर से कभी अनुराग पैदा नहीं हो सकता।

Friday, 6 April 2018

क्रिप्टो-करेंसी क्या हैं?

क्रिप्टो करेंसी एक आभासी मुद्रा हैं जिसे ऑनलाइन मुद्रा भी कहते हैं। जिस तरह से रुपये-पैसों को रखने के लिए हम जेब (पर्स) का इस्तेमाल करते हैं, ठीक इसी प्रकार से क्रिप्टो करेंसी रखने के लिए डिजिटल जेब की जरूरत पड़ती हैं।

प्राचीन समय में लोग मुद्राओं से अनजान थे। वे अपना काम वस्तु विनिमय प्रणाली के माध्यम से चलाते थे। इसका मतलब किसी जरूरत वाली वस्तु के बदले में किसी दूसरी वस्तु बदले में देनी पड़ती थी ।

विनिमय के तौर तरीकों में बदलाव हुआ। कालान्तर में  अलग-अलग राजवंशों ने अलग-अलग अपनी मुद्राएं जारी की। किसी ने सोने के सिक्के चलाये तो वही दूसरे किसी ने चांदी, फिर ताँबा आदि का.....

क्रिप्टोकरेंसी की शुरुआत 21 सदी मानी जाती हैं। क्रिप्टोकरेन्सी में बिटकॉइन को अर्थव्यवस्था का बादशाह माना जाता हैं। इसका आविष्कार 03 जनवरी 2009 में सतोषी नाकामोतो ने किया था जो अब तक अज्ञात हैं। इस व्यक्ति की पहचान अब तक नहीं हो पाई हैं । बिटकॉइन बनाने का असली मतलब था डिजिटल मुद्रा को बिना किसी तीसरे माध्यम के यानी बिना बैंक गए ही एक-दूसरे में पैसे का विनिमय हो सके ।

आज से ठीक पांच साल पहले
1 बिटकॉइन = 5 रुपये था जबकि अभी
1 बिटकॉइन= 50 हजार से भी ऊपर हैं।
( आंकड़े घटते-बढ़ते रहते हैं)

क्रिप्टोकरेंसी के दो प्रकार हैं।

1) फिएट क्रिप्टो
2) नॉन-फिएट क्रिप्टो

फिएट क्रिप्टो वैसी करेंसी हैं जिसे स्थानीय सरकार ( जैसे की भारत में भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा मान्यता दी जाती हैं) द्वारा वैध करार दी जाती हैं।

नॉन-फिएट क्रिप्टो करेंसी निजी करेंसी होती हैं। इसमें किसी सरकार हस्तक्षेप नहीं होता और अलग-अलग देशों में कही इसकी मान्यता मिलती हैं तो कही नहीं भी।

कुछ लोकप्रिय क्रिप्टोकरेंसियाँ हैं।
बिटकॉइन, एंथ्राल, रिप्पल आदि ।

क्रिप्टोकरेन्सी के फ़ायदे:-

1) यह उच्चतम सुरक्षा मानक  हैं और यह आपकी जानकारी को गुप्त रखता हैं।
2) इससे लेन देन में किसी तरह की फ्राडगिरी  नहीं होती।
3) लेन देन के लिए किसी बैंक या कोई और माध्यम नहीं बनता।
4) इसकी फीस काफी कम होती हैं।
5) इसका खाता घर बैठे खुल जाता हैं। कोई भागदौड़ या ज्यादा दस्तावेज की जरूरत नहीं होती ।

साभार:- इंटरनेट महोदय!!

Monday, 19 March 2018

ललकी गमछी

#ललकी_गमछी
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ललकी गमछी बड़ी काम की
ख्याति इसकी गजब नाम की।
सर पे रखो तो ताज हैं,
समाज का मान-मरजाद है।
गले में रखो तो हार हैं,
भोजपुरिहा का उपहार हैं ।
बोझ सहने में सहायक हैं,
सुखद, सहज और लायक हैं ।
कमर में बाँधों कमरबंद बनती हैं
फुरती, साहस और जुनून भरती हैं ।
नहाने के बाद मुख्य जरूरत हैं,
सोचो इसकी कितनी अहमियत हैं ।
ज़ख्म को बाँधने में सहायक हैं,
बोझ बाँधने में भी एकदम लायक हैं ।
         
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sujit1992.blogspot.com

Wednesday, 7 March 2018

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस ।

मैं नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।

मैं जन्म की जननी हूँ,
पालन करती हुँ, पोषण करती हूँ,
भूखे तन को तृप्त करती हूँ तन से ।
रोते हुए बच्चे को गले लगाती हुँ,
सर सहलाती हुँ,आँचल का अम्बर बनाती हुँ
लोरिया सुनाती हुँ खुद जग-जगकर ।
मैं एक नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
जिस घर में पैदा लेती हूँ,
बोझ बनती हुँ, बिन भविष्य के सुन,
सहती हुँ हर चिर-वियोग और ताने-बाने
आजाद नहीं इस खगोल पर
चौखट के अंदर सब सहती हुँ,
रीति-रिवाजों की कड़ियों से बंधी सुलगती
मैं एक नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
किसी ने मेरी अस्मिता लूटी
देख उसे किसी ने त्याग किया
पत्थर शिला को देख किसी ने उद्धार किया
बस यही मेरी कहानी है ।
अब देर नहीं, सबेर नहीं
तोड़ूंगी हर बंधन को मैं
नित नए रूप दिखाउँगी 
दैत्यों को सबक सिखाऊँगी
मैं नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।

Sunday, 4 March 2018

दो राजधानियों की प्रेम कहानी ♥️👇👇

दो राजधानियों की प्रेम ♥️ कहानी
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यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है. क़िरदार की भूमिका कहानी से अगर कुछेक अंश भी मिलती हैं तो लेखक को बड़ी खुशी होगी ।

ख्वाबों की दुनिया में चलते हुए अगर कदमों की चाल हकीकत में तब्दील होने लगे। नींबू जैसा मन पपीता की तरह पीला और बड़ा होने लगे तो वही अहसास है प्यार का.... 

वक़्त नदी है, दोनों छोर क्रमशः किनारे का रूप हकीकत और ख़्वाब होते है। एक छोर से दूसरे छोर के बीच उम्मीदों का बांध बाँध तो सकते है पर टिकना संभव कहाँ?

दरअसल यह कहानी दो जीव, दो दिल, दो जिस्म या दो जिंदा दिली प्रेमी-प्रेमिका का ही नहीं है अपितु दो राजधानियों का मिलन है। दिल्ली हमारे देश की राजधानी हैं और लखनऊ भी यूपी की। आज यही दो राजधानियों के बेमेल दो दिलों की हाल-ए-दास्तां सुनाता हूँ ।
कहते है कि किसी प्यार किसी धर्म, सम्प्रदाय, बड़ा-छोटा,कृत-विकृत या गोरा-काला में विभेद नहीं करता, यह तो एक जादू है जो एहसासों के तवे पर पकना शुरू होता है और पकते-पकते किसी का उतर जाता है या किसी को जीवन भर पकाता है।
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संगीत की दुनिया अजीब है दोस्तों। क्या खूब अपनी आवाज से दिल तक अपनी बातों को मनवाने लगता है, लोकतांत्रिक देशों में भी एक अलग सा साम्राज्य स्थापित करने के सपनें सजाने लगता है। जैसे कि मैं उसके दिल का राजा होता, वो हरपल मेरे बारे में सोचती रहती और मैं उसके। जब इश्क़ का सुरूर चढ़ता है तो सोचने का पैमाना लुल हो जाता है ।

याद करा दूँ, दिल्ली का इतिहास बहुत पुराना और दिलचस्प है । इसका उल्लेख महाभारत काल में हुआ है जब हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र ने पांड्वो को इसी के आसपास का क्षेत्र दिया था, तब वे इस नगर को बसाये थे और इन्द्रप्रस्थ नाम दिए थे।  कालान्तर में इसकी गरिमा दिल्ली सल्तनत के नाम हुई, परंतु यह अभिशाप रहा इसकी बागडोर बदलती रही। कहते है, यहाँ की भूमि रक्त से सिंचित है। सत्ता की लालच लिए लाखों लोगों की बलि बनी यह धरा.... हम तो दिल्ली को मिर्जा ग़ालिब के शहर  से जानते है। जो इस शहर को शायरी की दुनिया से रूबरू कराया, हर नौजवानों की जुबां इनकी अभी भी पकड़ है।

नदी का दूसरा छोर, लखनऊ भी अपने अतीत काल से ही विख्यात रहा है। प्राचीन कोसल राज्य, जो भगवान राम के अधीन था, को लक्ष्मण जी को समर्पित किये थे और लक्ष्मणपुर  से नाम बदलकर लखनऊ बना । यह नबाबों का शहर है, नवाब आसफ़ुद्दौला ने इसे समृद्ध किया। यह शहर  चिकन कढ़ी, और आम उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के मशहूर शायर मजाज लखनबी, मात्र 44 साल धरा पे रहकर अपने शायरी में जो अद्वितीय प्रसिद्धि पाई वो उल्लेखनीय है ।  कवि कुमार विश्वास जी कहते है कि इनकी लिखी किताब उस समय  एक दिन के लिये ही खास खास लोगो को मिलती थी, तब आज के जैसा युग नहीं था, वरन कॉपी पेस्ट मारकर घर-घर मे सैकड़ो प्रतियां होती ।

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अरे, हम असली कहानी तो भूल गये थे।
जैसा की ऊपर बताया दोनो शहर महाभारत और रामायण का हिस्सा रहा है, उसी तरह दोनों राजधानियों की प्रेम कहानी भी बिल्कुल माधुर्यता, सम्मोहक, और उत्कटपूर्ण है ।

रविआ की जिंदगी भी कुछ इसी कदर गुजर रही थी। नये सपनें थे, नई उमंगे थी और पहली बार असल प्यार की जिंदगी में जीने अहसास हुआ था। पिछले एक महीना से न तो खाना-पीना नीक लग रहा था और न ही नींद आ रहा था, बस मोबाइल में पता नहीं क्या क्या टिप-टॉप करते रहता । दिल्ली में रहकर यूपीएससी की तैयारी करने वाला रबी होली में घर आया। परिवार वाले बहुत खुश थे, गाँव के लड़के भी खुश थे कि होली खेलने वाला दोस्त घर आया है।  रबी की आधी रात तन्हाई में गुजर रहा था। मन की हिलोरें झोंके से चलती फिर एकाएक शांत हो जाती। होली के दिन वो घर में ही दुबके रहा और मोबाइल में ही लगा रहा। दादी को लग रहा था कि आज कल की डिजिटल इंडिया में पढ़ाई की वजह से मोबाइल पर ही पढ़ रहा होगा। मोबाइल की पढ़ाई में तल्लीन देखकर पूरे घर वाले आस लगाए है कि रबिया कोई अच्छा जॉब पकड़ेगा।
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रवि अपने कोचिंग का सबसे टॉपर लड़का है। हर सवाल को बखूबी सॉल्व कर देता, लूसेन्ट तो मुंहजबानी याद है। लेकिन इस बीच दो महीना के लिए आई पूर्णिमा की नजर रबि पर पड़ी, फिर क्या था । नजर की नजाकत ने ऐसा नजरिया बदला की नजरें बदल गई।
दो महीना दो दिन की तरह गुजरा, बीसवें दिन एक दूसरे की निगाहें नाज़िर हुई और सप्ताह में पाँच दिन का क्लास शनि, रवि की छुट्टी,गई तो गई, पर छीन गई सुनहले सपनें, आंख का सूकून, तन का चैन और एक पहाड़ सा दर्द का मंज़र..........
छोड़ गई वो पिंक हेयर क्लिप जो पीछे से दूसरे बेंच से  एक पराबैगनी किरणें निकलकर आ रही थी, जो सिर्फ उसे ही आकर दिखती और उसकी बात बात पर अवरोध करने वाली बीमारी ..असल में वो बीमारी नहीं थी, वही तो था सुकून देने वाला पल, कलेजे को ठंडक पहुँचाने वाली आवाज और नटखटी निराली अंदाज़ जिसे सुनकर ऐसा महसूस होता जैसे राजस्थान के मरुस्थल में बाढ़ आ गया है, मरुस्थल में मरे घास-पात, पेड़ पौधे अब जी गए है, ठूठ शिरीष और बबूल के पेड़ो में भी हरियाली आ गई हो!

वो बीता हुआ शुक्रवार का शूकर है जिंदगी भर याद रहेगी, उस मिरजई आंखें और वह अदा जिसका शिकार था रवि।  जब एक हल्की मुस्कान के साथ रास्ते से गुज़री और बोली...

Hi,,, ravi
How r u????
Meet me after class......

रवि के चेहरे से तो अवरक्त किरणें निकल रही थी, जो छन में सबको जलाकर प्यार की एक जिंदगी जीने का मजबूर कर रही थी। उसकी पिंक जूतियाँ, पिंक टीशर्ट और पिंक हेयर क्लिप जिसकी त्रिविमीय किरणों से बने केंद्र उसकी आँख थी, रेखा खण्ड को कितने डिग्री का कोण बना रही है, सोचने में डूब गया ।

क्लास खत्म होने के बाद मिनट भर के लिए भेंट हुआ । हाथों से हाथ इस तरह कस के पकड़ा जैसे कि इसकी छुअन जिंदगी भर भूले नहीं, फिर क्या था, कमीने दोस्तो ने आवाज लगा दी। रबी का मुंह पूरी तरह लाल हो चुका था। खरबूजे का पकना भला कौन नहीं पहचाने।  बस क्या था, उसी दिन से इश्क़ में गिरफ्तार हुआ,अब कैदी बना चुका था। हर सोच पूर्णिमा से ही शुरू और खत्म हो जाती । वो उसके जाने का दिन था पर कमीने दोस्तों की वजह से ठीक से नहीं मिल पाया था । 10 दिन बाद ट्विटर अकाउंट पर एक फॉलो आया, देखा तो लिखा था,
Purnima Sharma follow u.......
आगे के लिए थोड़ा इंतज़ार करें
मन का राही
गोप भरौली, बक्सर

Wednesday, 7 February 2018

अल्फाज़

वक़्त के पन्ने पलटे तो अचानक ख्याल आया
खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ?

बहुत देर लगी खुद को समेटते समेटते
यादों की रेत हवा में ठहर कैसे गई ?

तन्हाइयों के कफन में बंधा है ये जिस्म
मैं तो मिट्टी नही थीं, बिखर कैसे गई ?

हर पल कतरा कतरा मारा था जिसे उम्र भर
अपनी वो लाश पहचानने से आज मुकर कैसे गई ?

बेदम बेजान आरजूओं के जनाजे देखे थे कई
अपनी ही कब्र देखी तो सिहर कैसे गई ?

खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ??

-----    पूर्वा अग्रवाल

Sunday, 21 January 2018

जब जग ने सुनी वीणा की वाणी🎻🎻

ब्रम्हा जी ने हमें PK बना कर भेजा था। मानव पशुवत्व की तरह विचरण कर रहा था । जगत की रचना तो कर दी लेकिन जब पृथ्वी पर वीरान जंगल-जंगल, पहाड़ी-पहाड़ी, नदियों के तीरे तीरे जानवरों की भांति हमें भटकते हुए देखे तो सृष्टि की रचना नाकाम लग रही थी । तब उन्होंने अपना कमंडल से जल निकला और छिड़का तो माँ सरस्वती का प्रकट हुईं।
आप सभी जानते है कि वीणा माँ शारदा के हाथ मे सदैव रहता है और वीणा और वाणी में केवल दीर्घ इ की मात्रा का फेरबदल है । माता ने वीणा से स्वछंद और मधुर ध्वनि निकाली, पुरे देखने वाले हतप्रभ थे, अवाक रह गए और ऊँगली से तारों पर रगड़ने से निकल रही ध्वनि को सुनकर मन ही मन प्रसन्न हुए और माँ ने  श्रीमुख से स्वर निकाला । इसी का प्रतिफल लोगों पर पड़ा और लोगों का पशुवत्व से मानवत्व जीवन में तब्दील हुआ, जय माँ शारदा 
प्रोफेसर साहब पूरे गाँव में फूलों के शौखिन आदमी है । बगीचे में पूरा दिन खुरपी लेकर लगे रहते है। चम्पा, चमेली, तरह तरह के गुलाब, गेंदा, गेंदी, गुलदाउदी, कामिनी, अड़हुल आदि के फूल बोए है।  यू बात करें तो दुनिया का शायद ही कोई फूल होगा जो उनके बगीचे में नहीं मिलेगा । बक्सर नर्सरी का हर फूल उनके बगीचे में मौजूद है।
लेकिन गाँव में उन उदण्ड लड़को की भी कमी नही हैं, करीमन, सोहना और चिन्टूआ ताक में रहते है जब टाइम मिले फूल तोड़ लेते । दिन में पोरफेसर साहब लड़को से परेशान रहते है तो आधी रात में गाँव औरतों से । इसमें कोई शक नहीं कि नौरात्री में नौ दिन रात्रि जागरण पोरफेसर साहब को करना पड़ता है। औरतें  बारह एक बजे रात में ही अपना काम कर लेती । सुबह होता वही तमाशा 
लेकिन इस बार सरस्वती पूजा में पोरफेसर साहब ने अपना आशियाना बगीचे में ही बना रखा है पर उनकी पत्नी हीरा है । गाँव के हर सुख दुख में शरीक रहती है और अभी हमें तो फूल की जरूरत है । फूल की फरमाइश पहले ही पुरुब टोला से चिन्टूआ आ मै पहले ही चाची से कर दिया था।
फोर जी के जुग में भी शाम को गाँव के लोगों का बैठकी का मुख्य केंद्र उनका दुआर है । पुरुब टोला से महेंदर जादो, कमेशर और बीरेंदर और दखिन टोला के शशिकात, भीमकाका भी आ जाते है और पौने नौ बजे के समाचार चाय की घुट के साथ सुनते है पर परसो से पता नहीं किरपवा क्यों पहुँच रहा है ।
पोरफेसर साहब को इस बात का डाउट जरूर है कि गाँव में इस साल चार जगह सरस्वती पूजा रखा जा रहा है और कही न कही लड़के बागीचे के तरफ अपना रुख करेंगे । चाची ने पोरफेसर साहब को समझाया पर वे अपनी जिद पर अड़े रहे। किरपावा को पोरफेसर साहव के हर गतिविधि को भांपने के लिए पुरुब टोला से छोड़ा गया है, सरसोती पूजा के तीन दिन फूल का जुगाड़ हो जाए।
इस बार गाँव में दो जगह डीजे आया है और खुशी की बात है कि बसंत ऋतु का आगमन आज से ही होने वाला है । ऋतुओ में बसन्त सबसे प्रिय हर आदमी को लगता है और भगवान श्रीकृष्ण को भी । फूलों के बगीचों से निकल रही खुशबू वातावरण को सुहासित और आनंदित कर देती है तो दुसरी तरफ कोयल की कुक की ध्वनि कानों में पड़ती है तो गणेशवा का लीला देखते बनता है ।
कोयल कु बोलती है तो वो भी कु बोलता है ।
फिर दुबारा कु बोलती है वो भी पुनः बोलता है इस प्रतिस्पर्धा में दोनों अपने अपने जिद पर अड़े रहते है कि मै चुप नहीं रहूंगी तो गणेशवा भी । क्या गजब का समन्वय है एक दूसरे की ....
वर दे वीणा, वादिनी वर दे
हमें भी कुछ लिखने का श्रय दे । 
आप सभी दोस्तों को बसंत पञ्चमी, सरस्वती पूजा की हार्दिक बधाई ।

Saturday, 13 January 2018

एक संकल्प, विकल्प नही ।

अब समय नही संताप करने का
और दुश्मन को समझाने का
चलो उठो, संकल्प करो बस
कातिलो को सबक सिखाने का ।।

आलाप व्याप्त और चिर प्रतीत की
न ध्वनि को कर्ण तक जाने का
अब समय नही संताप करने का
और जाहिलों को समझाने का  ।।

है विकल, वियोग, विध्वंस यहाँ
माँ बनती रण में चंडी जब यहाँ
दुर्गाकाली व लक्ष्मीबाई बन के
करती है  यह पावन पुण्य धरा ।।

चुप रहने में  हानि है निज का
होगा कलिकाल,रक्तबीज वहाँ
अब समय नही संताप करने का
और दुश्मनो को समझाने का ।।

कर अटल निश्चय और लेके प्रण
उन शहीदों की आग बुझाने का
अब समय नही संताप करने का
और गीदड़ों  को समझाने का ।।

:- सुजीत कुमार पाण्डेय

Thursday, 4 January 2018

माँ यमुना साक्षात्कार- दिल्ली भाग 1

​ठिठुरती ठंड में रजाई से निकल कर संध्या की बेला में  यमुना के किनारे पहुँचा  ........ निगम बोध उत्तरी दिल्ली श्मशान स्थल ...; जहाँ पर लोग अपनी जीवन लीला अस्त कर अस्थि रूप लेकर सदा के लिए स्थिर हो जाते है । 

बड़ा ही अजीब दृश्य था । लोगों का मेला लगा हुआ था । एक के बाद एक आने जाने वालों की लगातार संख्या लगभग हजारो में थी । हालाँकि पुरुषों की तुलना में स्त्तियाँ कम थी । आने जाने वालों के मुँह से एक ही वाक्य निकल रहे थे । 


"राम नाम सत्य है"


और मुख्य द्वार पर ही लिखा था ।


"मुझे यहां तक पहुचाने के लिए शुक्रिया, इसके आगे हम अकेले ही चल जाएंगे"


वाकई बड़े से बड़े हस्ती वाले जिन्होंने महल और अटारी बना रखे हो या जिंदगी की सारी सुख-सुविधा मिल चुकी हो उनके परिजन मुख्य दरवाजों तक ही अपने मर्सिडीज कार ले आने की अनुमति है या फिर दूसरा जो चौक-चौराहों पर भीख मांग कर जीवन बिताया हो, दोनो के जीवन की लीला यही समाप्त होती है । राजा और रंक दोनो के लिए यहाँ कोई भेदभाव नही है। यहाँ जो भी आता है उसके घमंड और शौर्य की साहस चकनाचूर हो जाती । 


घाट पर कुत्ते, कौवे और बगुले मांस के लिए अपनी अपनी आस लगाए बैठे थे । क्षुधा तृप्ति के लिए लालायित को यदा कदा दो चार लठ खाना भी पड़ जाता था ।



यमुना घाट पहुँचने पर वहाँ बैठने के लिए बहुत सारे पत्थर के बेंच बनाया गया है, कुछ घंटे  गुजरने के बाद ठंड कुछ ज़्यादा ही लगने लगा । कुछ दूरी पर चार पाँच लोग अलाव जलाकर बैठे थे ।  माँ यमुना लहरों से बह रही ठण्डी हवाओं से ठंड ऐसा लग रहा था जैसे हवाओं का मिलन हड्डियों से हो रहा हो  । शाम के बाद अंधेरा होने लगा और शरीर मे आलस होने सोचते विचारते हुए ही न जाने कब नींद लग गई । जब आँखे खुली तो खुद को अकेला यमुना के तीर पाकर सहम गया । काफी देर सोचने के बाद भी यह वहम हो रहा था कि पूर्णमासी की चाँदनी रात में मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ।


पीछे की तरफ पांडवो के द्वारा बसाया गया विशाल नगर राजधानी इंद्रप्रस्थ की विशालता से अभिभूत होकर मुझे इस नगर के बारे में न जाने कहाँ से सोच आई । 


शीतल कलकल करती हुई माँ यमुना के सदृश्य हो ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरे मन मे उठे सवालों का जबाब यहाँ  मिल सकता है । तबतक यमुना नदी से बढ़ती आ रही धाराओं ने मुझे खुद में समाहित कर लिया । 

यह मेरे लिए एक अलग ही दुनिया से रुबरु करा रही थी। बैठे बैठे मुझे एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया  जिसपर नजर टिका पाना मुश्किल लग रहा था ।


दिव्य स्रोत से आ रही किरणों को देखकर मैं काफी डर गया ..और आस पास नजर दौड़ाया तो खुद को अकेला पा प्राण पखेरू उड़ गए ।


दिव्य पुंज से आवाज आई  ... 


डरो मत । ......................... वत्स ।


मैं   ...........कालिंदी हुँ।


मैं सूर्यपुत्री हुँ और मृत्यु के देवता यम की बहन हुँ । कृष्ण के ब्रज में "जमुना मैया" के नाम से जानी जाती हूँ । मैं  (कलिंद दुर्गम पर्वत से होकर यमुनोत्री के बंदरपूछ से होकर बहती हु) द्वापर युग से अब तक यहाँ बहती आई हूँ और नगर के लोगों के हर वक्त कल्याण की कामना करती हूँ । तुम्हारी उदासी को देख नही रहा गया । 


बोलो किस लिए चिंतित हो ? तुम्हे डरने की कोई जरूरत नही है ।

मैने दोनों हाथों को जोड़कर प्रणाम किया और सहज भाव से बोल पड़ा। 

लहरों ने एक बार फिर से ऊपर उठकर मेरे पास आकर रुक गया । फिर आवाज आई ।

मैं - माते, आप गंगा मईया की तरह गोरी क्यों नही हो, आपका रंग स्यामल क्यों है ?

यमुना :-  पुत्र, मेरे पिता भगवान सूर्य है जो मेरी माँ छाया है । मेरी माँ श्यामल रंग की थी इन्ही का प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा, इसलिये मैं श्यामल हूँ ।

मैं - माते मुझे इस नगर के बारे में विस्तृत जानकारी लेना चाहता हूँ । इतना कहते ही धाराओं की लहर ने मुझे तेज़ गति से बहती हुई आकर मुझे अपने आगोश में ले लिया और मेरी आँखों के सामने प्रकाश पुंज से एक स्यामल गौर स्त्री स्वरूप माँ का साक्षात दर्शन हुआ और मीठे स्वरों में बोली  ।

यमुना - पुत्र, मैं तुम्हारी सभी जिज्ञासाओं को पूरा करूँगी ।


मैं - जी, माते 


आगे की कहानी के लिए कृपया वक़्त लगेगा ।


Saturday, 25 November 2017

एक कशक :- कोशिश की

यह दूरियां अक्सर मुझे सताती है
वक्त-बेवक्त खुद-ब-खुद आकर तन्हाइयों से सराबोर कर देती है
विचलित,बेबस, बेपरवाह और आवारा मन उसके ओत-प्रोत होने के लिए व्याकुल रहता है

और इतना कुछ होना भी लाजमी है
पर खुद को क्या पता की जिंदगी इस कदर पराया बना देगी।

क्या एक तल्ख दीदार करने से भी खुद को जुदा कर देगी?

आंखों का बरबस यादों में समाए रखना और नींद का भी इस कदर जुदा हो जाना, बड़ा अजीब और गजब का समन्वय इन यादों और आँखों का है ।

मुस्कुराते हुए संजीदे चेहरे और चेहरे पर घिरे हुए बाल जिसकी महक आज के गुजरे कल की यादों का गुलाम बना बैठा हैं ।

आज तक तकते इन सुनहरे ख्वाबों को कैसे समझाऊं
कि जिस पर तुम्हें इतना गुमान था वह एक कोरी काल्पनिक है ।

आज भी भला कैसे भूल सकता हूं उन चेहरे की भाव भंगिमा और निश्चल आंखों को, जो पल भर में गंगा- यमुना की अविरल धारा एक साथ प्रवाहित कर देती थी और पलभर के लिए जीवन का सर्वस्व निछावर करने को मजबूर कर देती थी, जिसे शायद खुदा को भी एहसास ना हो  । आंखों से आंखों का आकर्षण जो गुरुत्वाकर्षण बल के अधीन होकर दूरियों को स्वतः ही कम कर देता था और पलभर के लिए देखकर हँसना और फिर बेबाक बोलते जाना ।

मनचली और कलकली सी आखों की टकटकी लगाकर देखना इस कदर बना देता था की जैसे चांद को देखते देखते ही चकोर पक्षी पूरी रात गुजार देता है ।

और अगले पल में मुस्कुरा के कह देना कि
भक्क,

ऐसे क्यों देखते हो। लगता है कि ......

बस इतना कहते 440 वोल्ट का करंट पूरे बदन में दौड़ जाना और पूरा बदन का सिहर जाना फिर खुद को सबसे बड़ा सौभाग्यशाली मानकर फुले ना समाना ।

यह मेरी पहली मुलाकात थी यकीनन मैं पहली बार कुछ ज्यादा ही डर गया था ।

बदन की बनावट कुछ इस तरह थी जैसे ईश्वर ने करोड़ों में एक बनाकर भेजा हो।

गहरी झील सी आंखें जिनमे ख्वाबों की नावे स्वतः ही गतिमान हो जाती है । पलकों की बनावट बिल्कुल मोरनी के पंख जैसे सावन महीने में मोर का पंख फैलाकर नृत्य के पश्चात शर्माते हुए पंखों को सिकोड़ लेना । पतली, लंबी और नुकीली नाक जो उभरे हुए चेहरे को चार चांद लगा देती है।

काले घने लंबे बाल और बालों में धारदार बनावट जो देखने में बिल्कुल अजीब सा लगता है चेहरे की लालिमा और शांतिप्रिय इस बात का एहसास करा रहा हो जैसे शालीनता और सुलक्षण और सुविचार से भरा हो ।

यकीन मानिए तो एक कोरी कल्पना है ।

Monday, 13 November 2017

शुभ बाल-दिवस🍖🍖🍝🍝🍭🍭

आज 14 नवंबर चाचा नेहरु जी का जन्मदिवस है । उनका छोटे छोटे बच्चों के प्रति प्यार दुलार, समर्पण, स्नेह और लगाव के रूप में ही बाल दिवस मनाया जाता है । यहाँ तक तो आप सब बखूबी जानते है पर चाचा नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री हुए थे बच्चों में देश के भविष्य के प्रति क्या भावना थी और क्या सपना पूरे होते हुए दिख रहे हैं ।

कहते है, शिक्षा ही देश को महान बनाता है । क्या वास्तविक शिक्षा देश के हर बच्चों को मिल रहा है ।
आधुनिक शिक्षा के परिवेश में शिक्षा का जिस तरह से व्यवसायीकरण और बाजारीकरण हो रहा है इस तरह से हर बच्चे को समुचित शिक्षा मिलना नामुमकिन है ।

नही । इसके बारे में चर्चा करना अभी बाकी है ।

वर्तमान समय मे सरकारी स्कूलों की बात की जाए तो ऐसा लगता जैसे खैरात में शिक्षा मिल रहा है और ख़ैरात की बात करे तो महज वह स्थान जहाँ केवल गरीबो के लिए दवा मिलने का केन्द्र है । जरूरी दवाओं की अनुपलब्धता और भर्ष्टाचार से लिप्त कर्मी,  विगत महीने ही जिले में किसी डॉक्टर साहेब को आशा कर्मी से लाखों रुपये गबन करते पकड़े गए ।

हर साल 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाता है इस दिन स्कुली बच्चों में खेलकूद से संबंधित प्रतियोगिता जैसे कबड्डी, खो-खो, दौड़ भाग और मनोरंजक गेम का आयोजन किया जाता है ।

अगर चाचा नेहरू के सपनों को सही साकार करना है तो स्कूलों का निजीकरण और व्यावसायिकरण को देश से हटाना होगा साथ ही  सरकारी विद्यालयों और शिक्षकों को अपने कर्तव्यों के प्रति सही रूप से समर्पण करना होगा।  हर सरकारी स्कूल के प्राथमिक विद्यालय से ही कंप्यूटर का ज्ञान कराना होगा, व्यावसायिक शिक्षक को रखना होगा और शिक्षा के क्षेत्र से धाँधली रोकनी होगी ।

।। शुभ बाल दिवस ।।

Wednesday, 8 November 2017

हैप्पी हैप्पी माई डिअर

चिंटूआ कल से ही घर में उत्पात मचा के रखा है कि हम भी इस बार दोस्तों के साथ गंगा जी के किनारे जाकर फर्स्ट जनवरी का पार्टी मनायेंगे । जब काका को इस बात का खबर लगा तो बोले की पार्टी अऊर गंगा जी के तीरे ....ई कैसा पार्टी है । किस बात का पार्टी अऊर गंगा जी के किनारे काहे ?
कलुआ बोला काका कल फस्ट जनवरी नु है इसी का पार्टी ...
 काका सहम गए फर्स्ट जनवरी का पार्टी गंगा जी के किनारे काहे ...मना कर दिए कि अभी एक तारीख को पिंसिन मिलेगा त पैसा होगा अभी हमारा हाथ खुद ही खाली है ।
फर्स्ट जनवरी आने का इंतज़ार हर किसी को होता है । चाहे सुदूर गाँव-गिराज के लोग हो या शहर के ...
चहल पहल सब जगह दिखाई पड़ती है । 31 दिसंबर को सबकी सेटिंग् रहती है । पार्टी मनाने का जुनून सबके सर पर शुमार रहती है । कोई  मनाने के लिए गोआ जाता है तो कोई सिक्किम ,कोई हिमाचल की तराईयों में तो कोई नदी, तालाब या नहर का किनारे ही सही । आने वाला साल खुशनुमा हो, बेहतर और फलदायक हो इसकी आस लगाए रहते है ।
आपस में एक बहस होती है, 2015 मेरे लिए अच्छा नही था, 2016 ठीक था मेरा ख्वाब पूरा हुआ था , 4 साल जीतोड़ मेहनत करने के बाद नौकरी मिली थी और नया जमीन भी खरीदा था,लेकिन 2017 उतना अच्छा नही रहा । 2017 तो विराट कोहली के लिए अच्छा था क्योंकि इतनी सुंदर अनुष्का मिली । रोहित शर्मा के लिए भी ठीक रहा क्योंकि इसने भारत का नाम रोशन किया और इस साल सबसे ज्यादा छक्का मारकर  नाम कमाया,इत्यादि चर्चा करते रहते है ...
पार्टी की मनाने की सोच में अचानक धियान 2012 में चला गया । हाय रे दइया ...कहाँ गये वो सब दिन जब हम पूजावा को वेलेंटाइन कार्ड देने के चक्कर मे खूब कुटाये थे । क्या प्यार था इसके बाद पियार पर यकीन नही हुआ तो उसने काली माई अऊर बरहम बाबा का किरिया खिया के यकीन दिलाई थी कि सूरज पूरब से पच्छिम उग सकता है लेकिन खखनु हम तोहरे प्यार के बिना नही .... दिल के बेचैनी अऊर धड़कन के आवाज करेजा पर कान रखकर रहरी में सुनती थी । खखनु भी फर्स्ट जनवरी के दिन बगसर पिपरपाती रोड से गुरहिया जलेबी अऊर समोसा लेकर चुपके से साझी के साढ़े सात बजे दिए थे ..  उस समय पियार का जुनून बाजार से शुरू और बाजार में खत्म हो जाता था ... एक बार दर्शन के लिए चौक चैराहे पर घंटो बैठकर आँखे इंतज़ार में अंधी और कान बहरे हो जाते थे ... का बात है ललन के लइकवा रोज चौक पर ही बैठा रहता है ...    तब अब के जइसा फेसबुक, भटसेप नही था।
जरा सोचिए, फर्स्ट जनवरी को हम सभी हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई भाई पर्व की तरह क्यों मनाते है ? सीधा जबाब है हम टीवी, अखबार में देखते है, पढ़ते है कि बड़े बड़े लोग टीवी पर प्रोग्राम के जरिये मनोरंजन करते है, कंपनियां नए साल का ऑफर देती है, पब, बार, रेस्टोरेंट वाले सजाकर रखते है और ग्राहकों को लुभाते है इत्यादि से ग्रसित होकर पार्टी का आयोजन करते है पर पार्टियां भी ऐसी जिसमे लाखों बेजुबानों की बलि चढ़ा दी जाती है, मैकडॉनल्ड्स, बेगपिपर, वोडका और न जाने कितने नशीले पदार्थों के माध्यम से एक रात में लोग लाखों रुपये पानी की तरह बहा देते है । पोस्ट का मतलब ये नही है कि आप इस दिन शराब मत पियो, मुर्गा मांस मत खाओ बल्कि मतलब यह है कि इस दिन नये नए लड़को को बेबड़ा बनने के लिए प्रेरित न करो ।
अगर सच मे फर्स्ट जनवरी मनाना है तो माँ बाप की सेवा करो, पूरे परिवार के साथ किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा घूमने जाओ, ठिठुरते ठंड में जरूरत मंदो को कंबल दो, भूखे प्यासे को भूख मिटाकर तृप्त कराओ ताकि माँ-बाप, गरीबो से आपके लिए दिल से दुआ निकले और यही दुआ आपको नए साल के लिए खुशियों की सौगात लाएगी ।


मित्रों, अगर नए साल में कुछ बदलाव लाना तो अपने मित्रों, परिवारजनों, और सगे संबंधियों के बीच हुए वाद-विवाद को मिटाकर गले लगाओ साथ ही प्रतिज्ञा करो कि हम एक दूसरे के सुख-दुख में परस्पर शामिल रहेंगे और खुशियो के साथ भेदभाव जैसी विसंगतियों, देश की कुप्रथाओं को जड़ से उखाड़ फेकेंगे ।
यही सुविचार के साथ ...नव वर्ष की अग्रिम बधाई।


Sunday, 29 October 2017

सतर्कता जागरूकता सप्ताह 30.10 से 04.11

भाइयों,
हम सीधे- साधे गाँव के लोग है । भ्रष्टाचार शब्द सुने नही है लेकिन हॉ, कसम से सही अर्थ बता देंगे, क्योंकि बचपन से ही हम सन्धि विच्छेद करने में माहिर आदमी है ।

भ्रष्टाचार -  भ्रष्ट+ आचार ।

आचार की बात जब भी आती है, हमारे जीभ से पानी आने लगता है । यानी लालच बढ़ा देता है और यही लालच हमारे समाज को, राज्य को, और देश को बर्बाद करने लगा है ।

विश्व में भारत भ्रष्टाचार के मामले में 94वें पायदान पर है। भ्रष्टाचार के कई रंग-रूप है जैसे रिश्वत, काला-बाजारी, जान-बूझकर दाम बढ़ाना, पैसा लेकर काम करना, सस्ता सामान लाकर महंगा बेचना आदि।

भरष्टाचार ऐसी बीमारी है जो जनमानस के दिमाग को धीरे-धीरे खोखला बना देती है और इसके प्रभाव से सत्य और  ईमानदारी फीकी पड़ती जा रही है । आसमान पर उड़ने का हौसला रखने वाले को धरा नसीब होती है, हौसला रूपी सारे पंख टूट जाते है जब बगल का चिन्टूआ जो पढ़ने में तरह बाइस था, आज 10 लाख घुस  देकर स्टेशन मास्टर बन गया । ऐसे बहुत से चिन्टूआ  है जो बैंक पीओ, दरोगा, मास्टर और ना जाने क्या क्या बन जाते है जबकी तेज-तराज लड़को के हौसले पस्त हो जाते है और उम्मीदें ठंडी होकर पेट पालने के लिए निकल पड़ते है रोजी मजूरी करने ....

आजकल की भर्तीयो को आपने बेहद करीब से देखा होगा । सरकार के लाख लगाम लगने के बाबजूद पेपर का लीक होने आम बात बन चुका है । कभी SSC सीपीओ का पेपर लीक हो जाता है तो कभी सीजीएल का तो कभी सचिवालय क्लर्क का तो कभी बैंक पीओ का …..

भर्ष्टाचार दिमाग की ऐसी उपज बनते जा रहा है जिसका विनाश न होकर दिन प्रतिदिन फ़लीभूत
होते जा रहा है । इसमें कोई संसय नही की, इनमे कुछ ऐसे तंत्र मौजूद होते है जिन्हें अच्छी खासी माहवारी मिलती है, इसके बावजूद भी जेहन में ऐसी गंदी सोच को बढ़ावा दे रहा है ।

बैंकों में आपको लोन लेना हो या कोई संस्थान कोई जरूरी कागजात निकालनी हो । स्टेशन पर टिकट बनवानी हो या किसी धार्मिक संस्थान में माथा टेकने हो । आपको इन भ्रष्टाचारियो के माध्यम से होकर गुजरना मजबूरी बन जाता है और अगर ऐसा नही करो तो लोग बेवकूफ या अन्य नाम दे देते है ।

सतर्कता जागरूकता अभियान सप्ताह दिनांक 30 अक्टूबर से 04 नवंबर तक मनाया जा रहा है । जिसका मोटो है --

मेरा लक्ष्य -- भ्रष्टाचार मुक्त भारत ।

अगर हम सब ईमानदारी से अपना काम करे, ईमानदारो का साथ दे और समाज मे भरष्टाचारियों के खिलाफ़ लड़े तो हमारा सपना साकार हो सकता है । सतर्कतापूर्वक रहना हम सबकी जिम्मेदारी भी है । इसके खिलाफ लड़ाई उस भारतीय से शुरू होगी जो इस लड़ाई के अंतिम लाइन में खड़ा है ।

आजकल आधुनिक उपकरणों का अभाव नही है जो इनके विरुद्ध में मिशाल कायम कर रहे है पर जरूरत है इसे अधिक से अधिक विस्तार करने की । कुछ बेहतरीन माध्यम मोबाइल, कैमरे, सीसीटीवी आदि नकेल के मुख्य स्रोत है ।

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Tuesday, 17 October 2017

दिलों की दीवाली, हैप्पी दीवाली ।

6 साल का रिंटूआ इस लिए सुबह से खुश था कि पापा कल शाम को जो पटाखे लाये है वो सुबह देने के लिए बोले है । मन की बेचैनी रात भर इसलिए सोने नही दी कि कही पापा फुलझड़ी और अकाशबाड़ी लाये है या नही । करवट लेते लेते ही सुबह 5 बजे गए, जगकर मम्मी को कहता है उठो, भोर हो गया है । तबतक आँगन में सोनुवा को देखकर,जाता है न जाने क्या क्या काना फूसी चलती है ।

पता नही बिटूआ के पापा कहाँ से पड़ाका लेकर आते है । लगता है एटम बम और छुरछुरी दोनो लुधियाना से ही लेकर आये है क्योंकि उसके जैसा किसी का आवाज नही आ रहा है ।  हॉ, अगले साल मैं भी चाचा से बोल दूँगा कि पटना से ही लाएंगे क्योंकि बक्सर में बढ़िया पड़ाका नही आया है । रहूला बोलता उठता है , भक्कक।। साला तुमलोगो को क्या पता, पिपरपाती रोड का पड़ाका का हाला है, मस्त आवाज करता है ।

10 साल का आरव पहली बार दीवाली में दिल्ली से आया है क्योंकि दिल्ली में पटाखा बन्द है । आरव की पटाखा छोड़ने की  जिद्द ने ही उनके पापा को इस बार घर बुलाया है । नही तो वे लोग आते कहाँ है । दादा दादी गाँव का सब खेत बेचकर अपना जैसे तैसे भोजन चला रहे है । 2 भाई है लेकिन कोई बात तक का नही पूछता । एक दिल्ली में परिवार के साथ है तो दूसरे बर्नपुर में , न जाने कितनी साँझ ऐसे निकल जाती है जब खाना भी नही बन पाता ।

भाई, परब तेव्हार तो केवल पैसे वालो का है । अब देखो निलेशवा के घरे पटाखा, मोमबती तो दूर खाने के भी लाले पड़े है । पता नही भगवान कहाँ सोये है, बेचारे का परिवार को क्या होली,दीवाली ....

आज दीवाली है । सबके घरों में साफ सफाई जोरो पर चल रही है वही रामेशवा निखट्टू बन बैठा है । आर्डर फरमाईस कर दोनों भाइयों से सुबह 6 बजे से काम मे लगाया है । एक भाई सुबह से झाड़ू लेकर पूरा घरों की सफाई तो दूसरा परसों से ही पेंट और रंगोली बनाने में लगा है । साल का परब है । माता लक्षमी साफ सफाई में ही बास करती है ।

लड्डूवा के चारो भाई  5 दिन से लड्डू और तरह तरह की मिठाईया बनाने में व्यस्त है बिक्री जोरों पर चलेगी इसलिए एडवांस में माँग की जा रही है तो वही नया भोजपुर स्थित रामपुर का पेड़ा के लिए सैकड़ो किलो का बुकिंग हो चुका है ।

बाजारों में मिल रहे चाइनीज इलेक्ट्रॉनिक झालर लाख बन्द के बावजूद भी जोरो पर बिक रही है । पिटुवा 500 का लाकर पूरे घर मे लगा चुका है । ऐसा लगता है कि पूरे गाँव मे लक्षमी पहले उसके घर ही आएगी । इसे देख  आधा गाँव पूरी तरह से मकानों को सजा दिया है । क्या खूबसूरत माहौल है ।

और मैं आप सभी को शुभ दीवाली बोलने को बेताब हूँ । माँ लक्षमी आप सभी के जीवन मे पैसे रुपये से ऐसे भरे कि खुद घनचक्कर में पड़ जाए

बैंक खोलें या फॉर्म हाउस

और श्री गणपति जी सुख, शांति और सौहार्द्र भर खुशहाल रखे । हम सबका आपस मे भाई चारा और परस्पर सहयोग के साथ दूसरे के सुख दुख में गले मिलकर एक स्वच्छ समाज बने, कामना करता हूं ।

।।शुभ दीवाली ।।