Sunday, 22 April 2018
Saturday, 14 April 2018
सतुआ न ।🍒🍎
अभी स्कूल की छुट्टी भी नहीं हुई थी। एक घंटी बाकी था तब तक सोनुआ आकर बोला।
आज सतुआनी ह, ई साल ख़ालिये जाई का ।
हम क्लास में दूसरे बेंच पर बैठे हुए ही तिरछी आँखों से पीछे देख रहे थे। पीछे चल रही साज़िश किसी के नव कपोल आम तोड़ने की थी। वैसे शुरू से ही चोरी में कम लेकिन चोरी में तोड़े गए सामान को बटोरने में माहिर आदमी समझता था।
....अंसारी सर बोल पड़े...
सुजीत कुमार पाण्डेय"
** पुनर्जागरण किसे कहते हैं?
मेरी तंद्रा खुली, फटाफट खड़ा हुआ। इतने देर में दूसरा सवाल जहाँ तक पूछते , बोल दिए
बेंच के ऊपर खड़ा अपनी शक्ल दिखाओ।
लजाते शर्माते हुए खड़ा हुआ और तब तक क्लास में ठहाके शिकार हुआ ।
क्या तुम क्लास में हो ?
Tuesday, 10 April 2018
"कुछ यादगार लम्हें......की!!!
""कुछ यादगार लम्हें .........की!!!!""
मुझे अच्छी तरह से याद हैं!!..
जब मैं पहली बार तुमसे मिला था! वो दिन बजट-सत्र का आखिरी दिन था और मैं पहली बार दिल्ली की जमीं पर कदम रखा था।
ना दिल में चैन था और ना मन को सुकून! हर वक़्त याद कर कर के मन विचलित और रूह परेशान था।
भला याद करूँ भी क्यों नहीं?!!..
तुम मेरे रूह में इस कदर समा गई थी, हमबिस्तर बन के। तुम्हारी जरा सी भी आहत मुझे बेचैन कर देती थी और मैं खोजने लगता था विकल होके, और तुम कही छुप जाती थी और हाँ...!!
मिलती कहाँ थी, आसानी से ....
असल में तुम्हारा और मेरा खून का रिश्ता जो ठहरा।
तुम्हारे छोटे छोटे दाँतो की काटी हुई चुभन का तो मैं मुरीद हो गया था !!, जहाँ भी काटती,,,, वहाँ का दाग भी कितना भयानक होता और ऐसे दाग को लोगों से छुपाना पड़ता वरना मेरी खिल्ली उड़ जाती।
पता हैं एक बार घर जो गया था। तुम्हारे शातिर बदमाशी को देखकर घर वाले भी हैरान थे। लाल-लाल के चकते जो इतने खतरनाक दिख रहे थे। जो जख्म हरे थे वे दवा लगाने के बाद भी जल्दी से ठीक नहीं हुए।
ख़ैर अभी कुछ चैन हैं जबसे चारपाई बदली हुई हैं।
#""खटमल की याद में""#
Monday, 9 April 2018
!! रूह संवाद!!
कहते हैं!!"
वक़्त गतिमान हैं।
यह अटल और शाश्वत हैं।
बदलता वक़्त घावों को तो भर सकता हैं पर,
उनका क्या जो जलते हैं बिन बाती के ज़रा-जरा-सा।
उमड़ पड़ते हैं ख्वाबों तले
मचल उठते हैं उन लहरों-सा
जो एक मिलन की आस में
उछल पड़ती हैं उन आसमाँ की ओर....
पर होता नहीं नसीब। फिर क्यों?
निकल पड़ते हैं अश्क़,
तोड़ सारे बाँधो का किनारा,
उम्मीद ही न बनता हैं सहारा,
क्या यही होने का अहसास हैं,
झुठलाती हैं वो कहकर...
"नहीं तो !!"
शायद ये गलतफहमी हैं तुम्हारी।
हाँ!! , मैं भी ठहरा एक जिद्दी,
न रुकने वाला,न थकने वाला,
वक़्त जख्मों को भर सकता हैं
पर ज़रूरी नहीं हर मर्ज की दवा ही हो।
कुछ मर्ज की दवा खुद खुदा बनाता।
"बोला:- .....
सुनो!!
दावाग्नि में जले उपवन में पत्ते पल्लवित हो सकते हैं पर
मुखाग्नि के स्वर से कभी अनुराग पैदा नहीं हो सकता।
Friday, 6 April 2018
क्रिप्टो-करेंसी क्या हैं?
क्रिप्टो करेंसी एक आभासी मुद्रा हैं जिसे ऑनलाइन मुद्रा भी कहते हैं। जिस तरह से रुपये-पैसों को रखने के लिए हम जेब (पर्स) का इस्तेमाल करते हैं, ठीक इसी प्रकार से क्रिप्टो करेंसी रखने के लिए डिजिटल जेब की जरूरत पड़ती हैं।
प्राचीन समय में लोग मुद्राओं से अनजान थे। वे अपना काम वस्तु विनिमय प्रणाली के माध्यम से चलाते थे। इसका मतलब किसी जरूरत वाली वस्तु के बदले में किसी दूसरी वस्तु बदले में देनी पड़ती थी ।
विनिमय के तौर तरीकों में बदलाव हुआ। कालान्तर में अलग-अलग राजवंशों ने अलग-अलग अपनी मुद्राएं जारी की। किसी ने सोने के सिक्के चलाये तो वही दूसरे किसी ने चांदी, फिर ताँबा आदि का.....
क्रिप्टोकरेंसी की शुरुआत 21 सदी मानी जाती हैं। क्रिप्टोकरेन्सी में बिटकॉइन को अर्थव्यवस्था का बादशाह माना जाता हैं। इसका आविष्कार 03 जनवरी 2009 में सतोषी नाकामोतो ने किया था जो अब तक अज्ञात हैं। इस व्यक्ति की पहचान अब तक नहीं हो पाई हैं । बिटकॉइन बनाने का असली मतलब था डिजिटल मुद्रा को बिना किसी तीसरे माध्यम के यानी बिना बैंक गए ही एक-दूसरे में पैसे का विनिमय हो सके ।
आज से ठीक पांच साल पहले
1 बिटकॉइन = 5 रुपये था जबकि अभी
1 बिटकॉइन= 50 हजार से भी ऊपर हैं।
( आंकड़े घटते-बढ़ते रहते हैं)
क्रिप्टोकरेंसी के दो प्रकार हैं।
1) फिएट क्रिप्टो
2) नॉन-फिएट क्रिप्टो
फिएट क्रिप्टो वैसी करेंसी हैं जिसे स्थानीय सरकार ( जैसे की भारत में भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा मान्यता दी जाती हैं) द्वारा वैध करार दी जाती हैं।
नॉन-फिएट क्रिप्टो करेंसी निजी करेंसी होती हैं। इसमें किसी सरकार हस्तक्षेप नहीं होता और अलग-अलग देशों में कही इसकी मान्यता मिलती हैं तो कही नहीं भी।
कुछ लोकप्रिय क्रिप्टोकरेंसियाँ हैं।
बिटकॉइन, एंथ्राल, रिप्पल आदि ।
क्रिप्टोकरेन्सी के फ़ायदे:-
1) यह उच्चतम सुरक्षा मानक हैं और यह आपकी जानकारी को गुप्त रखता हैं।
2) इससे लेन देन में किसी तरह की फ्राडगिरी नहीं होती।
3) लेन देन के लिए किसी बैंक या कोई और माध्यम नहीं बनता।
4) इसकी फीस काफी कम होती हैं।
5) इसका खाता घर बैठे खुल जाता हैं। कोई भागदौड़ या ज्यादा दस्तावेज की जरूरत नहीं होती ।
साभार:- इंटरनेट महोदय!!
Monday, 19 March 2018
ललकी गमछी
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ख्याति इसकी गजब नाम की।
समाज का मान-मरजाद है।
भोजपुरिहा का उपहार हैं ।
सुखद, सहज और लायक हैं ।
फुरती, साहस और जुनून भरती हैं ।
सोचो इसकी कितनी अहमियत हैं ।
बोझ बाँधने में भी एकदम लायक हैं ।
■■■■■■■■■■■■■■■■■
sujit1992.blogspot.com
Friday, 9 March 2018
एक यात्रा ऐसा भी ।
#एक_यात्रा_ऐसा_भी
आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो से जाने का नहीं था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।
बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते, चलना है क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!
मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।
हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।
रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?
अवाक हुआ इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।
याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?
दिये निकाला रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।
वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।
एक यात्रा ऐसा भी ।
#एक_यात्रा_ऐसा_भी
आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो से जाने का नहीं था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।
बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते, चलना है क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!
मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।
हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।
रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?
अवाक हुआ इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।
याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?
दिये निकाला रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।
वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।
Wednesday, 7 March 2018
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस ।
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
पालन करती हुँ, पोषण करती हूँ,
भूखे तन को तृप्त करती हूँ तन से ।
सर सहलाती हुँ,आँचल का अम्बर बनाती हुँ
लोरिया सुनाती हुँ खुद जग-जगकर ।
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
बोझ बनती हुँ, बिन भविष्य के सुन,
सहती हुँ हर चिर-वियोग और ताने-बाने
चौखट के अंदर सब सहती हुँ,
रीति-रिवाजों की कड़ियों से बंधी सुलगती
मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
देख उसे किसी ने त्याग किया
पत्थर शिला को देख किसी ने उद्धार किया
बस यही मेरी कहानी है ।
तोड़ूंगी हर बंधन को मैं
नित नए रूप दिखाउँगी
Sunday, 4 March 2018
दो राजधानियों की प्रेम कहानी ♥️👇👇
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How r u????
Meet me after class......
गोप भरौली, बक्सर
Wednesday, 28 February 2018
बसन्ती बयार ~ हैप्पी होली ♥️♥️
गोप भरौली, सिमरी,बक्सर....जहाँ की आबादी है लगभग 1200, कुछ नए आने वाले मेहमानों को छोड़कर ... भले ही इस बार वेलेंटाइन-डे खूब मना है। कुछ नई शादियां भी हुई है, अनुमानों के आंकड़े कुछ इधर-उधर हो सकते है। हाँ, ..इतना जरूर कहूँगा की इस बार की ठंडी में गाँव के बुजुर्गों का स्वास्थ्य अच्छा रहा, पूड़ी नहीं दिये...... ईश्वर करें! इसी तरह स्वस्थ, सुखी और परिवार का मार्गदर्शन करते रहें।
गुरु जी मेरी दिमाग रूपी गाड़ी में पेट्रोल डालते डालते थक
चुके थे, यदाकदा एक दो छड़ी गुस्से में लगा भी देते पर इसकी ग्लानि उन्हें ही होती, इसका कोई खास फायदा न पाकर एक नई तरकीब निकाल दिए ।
शर्त ये थी कि फागुन का महीना चल रहा है और उस समय शादी का लगन बहुत ज्यादा था। वे बोले, मैंने तुम्हारे लिए एक ख़ूबसुनदर लड़की भी ढूंढ़ रखी है। उसके मम्मी-पापा भी शादी के लिए लड़का खोज रहे है लेकिन उनका कहना है कि जो लड़का 20 तक पहाड़ा याद कर लेगा उसी से अपनी लड़की का शादी करेंगे। शर्त मेरे दिमाग में एक घर कर गया और दिमाग में एक नई दुनिया जीने के लिए प्रेरित कर रहा था। बचपन की बचपना में दूल्हे के साथ छोटा लड़का (सहबाला ) का भी तेवर सातवें आसमान पर रहता है ।
अन्त में मैंने 20 तक पहाड़ा तो याद कर लिया पर, चूक हो गया, खाली पड़ गई मेरे सपने की अहसास, एक ऐसा बंसन्त जिसे मैंने 15 साल पहले सपनों की दुनिया मे सजाया करता था। असली गुरु वही होता है जो बच्चों की बचपना समझता है।
खैर, गुरु जी नहीं रहे! इसका बहुत पछतावा है। इस बार की होली मैं अपने स्व गुरु जी को समर्पित करता हूँ। वे जहाँ भी हों, जिस रूप में भी हों, हमारी शुभकामना उन तक पहुँचे । एक और खेद है इस होली मैं अपने घर भी नहीं रह पा रहा हुँ, ग्लानि तो है। आप सभी मित्रों को होली की हार्दिक शुभकामना।
दुश्मनी को छोड़ सबको गले लगायें ।
कुछ रंग लगाएं और कुछ गुलाल लगायें
अपना छोड़ औरों के घर का फुआ खायें।।
Wednesday, 7 February 2018
अल्फाज़
वक़्त के पन्ने पलटे तो अचानक ख्याल आया
खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ?
बहुत देर लगी खुद को समेटते समेटते
यादों की रेत हवा में ठहर कैसे गई ?
तन्हाइयों के कफन में बंधा है ये जिस्म
मैं तो मिट्टी नही थीं, बिखर कैसे गई ?
हर पल कतरा कतरा मारा था जिसे उम्र भर
अपनी वो लाश पहचानने से आज मुकर कैसे गई ?
बेदम बेजान आरजूओं के जनाजे देखे थे कई
अपनी ही कब्र देखी तो सिहर कैसे गई ?
खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ??
----- पूर्वा अग्रवाल
Sunday, 21 January 2018
जब जग ने सुनी वीणा की वाणी🎻🎻
कोयल कु बोलती है तो वो भी कु बोलता है ।
फिर दुबारा कु बोलती है वो भी पुनः बोलता है इस प्रतिस्पर्धा में दोनों अपने अपने जिद पर अड़े रहते है कि मै चुप नहीं रहूंगी तो गणेशवा भी । क्या गजब का समन्वय है एक दूसरे की ....
हमें भी कुछ लिखने का श्रय दे ।


