Thursday, 3 May 2018

!! मेरी रूह !!

* मेरी रूह *
मेरी रूह बसती है उस दुवार पर,
जहाँ रोज सुबह के आठ बजे सुकुरती डेरा डालती है। और जब वो पूँछ हिलाते हुए पहुँचती है, तो माँ कहती है

"जा एगो रोटी दे दऽ, बेचारी भूखाइल होई"

मेरी रूह बसती है उस घर में,
जहाँ पेट भरने के बाद भी माँ जबरदस्ती अपने हाथों से ठूँस-ठूँस कर खाना खिलाते हुए कहतीीm है..

"खा ल, काहे काहे चिंताऽ करत बाड़ऽ!,  तहरा कमाई के आसरा नइखे"

मेरी रूह बसती है वहाँ,
जहाँ एक गइया है जो सुबह-सुबह खाने के लिए मकई की टाटी पर पूँछ पटकती है और लेट होने पर अलार्म के तौर पर रंभाती है।

मेरी रूह बसती है उस खलिहान में,
जहाँ हम बचपन में क्रिकेट और बॉलीबाल खेलते थे। इस दौरान खेल गेंद किसी के पाथे हुए गोबर में चले जाने से उसे कचटने पर गालियाँ सुनकर हँसते थे।

"तब ना तो कोई अदब था और ना ही कोई गुरुर"

मेरी रूह बसती है ब्रह्म बाबा स्थान में,
जहाँ मेरा बचपन घोड़ा बैठने, लट्टू, गोली, चीका, कबड्डी खेलने में गुज़रा। वहाँ जब बारिस होती, तो बेंग की आवाज सुनने के लिए टाइम निकाल लेते और फुरसत से कागज की नाव बनाते।

" पूरे गाँव का आस्था और भक्ति का केन्द्र है"

मेरी रूह बसती है उस आँगन में,
जहाँ होली के दिन पंकजवा भाँग खाके अपना भउजी पर रंग से जादा गोबर उड़ेलकर होली खेलता था।

"तब ना आपस में बैर था, न कोई आशंका"

मेरी रूह बसती हैं मेरे गाँव गोप भरौली,सिमरी,बक्सर में,
जहाँ कोई आलीशान बिल्डिंग नहीं हैं,
गुजर-बसर करने लायक कुछ कच्चे-पक्के-करकट-माटी के मकान, जिन तक अभी पक्की सड़क नहीं पहुँची है, सुना है वो कहीं रास्ते में हैं

" पर बसता वहाँ सुकून हैं"

            :-  सुजीत पाण्डेय छोटू

【विशेष आभार:-  Sri Krishna Jee Pandey】

Saturday, 14 April 2018

सतुआ न ।🍒🍎

अभी स्कूल की छुट्टी भी नहीं हुई थी। एक घंटी बाकी था तब तक सोनुआ आकर बोला।

आज सतुआनी ह, ई साल ख़ालिये जाई का ।

हम क्लास में दूसरे बेंच पर बैठे हुए ही तिरछी आँखों से पीछे देख रहे थे। पीछे चल रही साज़िश किसी के नव कपोल आम तोड़ने की थी। वैसे शुरू से ही चोरी में कम लेकिन चोरी में तोड़े गए सामान को बटोरने में माहिर आदमी समझता था।

....अंसारी सर बोल पड़े...
   सुजीत कुमार पाण्डेय"

** पुनर्जागरण किसे कहते हैं?
मेरी तंद्रा खुली, फटाफट खड़ा हुआ। इतने देर में दूसरा सवाल जहाँ तक पूछते , बोल दिए

बेंच के ऊपर खड़ा अपनी शक्ल दिखाओ।
लजाते शर्माते हुए खड़ा हुआ और तब तक क्लास में ठहाके शिकार हुआ ।

क्या तुम क्लास में हो ?

Tuesday, 10 April 2018

"कुछ यादगार लम्हें......की!!!

""कुछ यादगार लम्हें .........की!!!!""

मुझे अच्छी तरह से याद हैं!!..
जब मैं पहली बार तुमसे मिला था! वो दिन बजट-सत्र का आखिरी दिन था और मैं पहली बार दिल्ली की जमीं पर कदम रखा था।

ना दिल में चैन था और ना मन को सुकून! हर वक़्त याद कर कर के मन विचलित और रूह परेशान था।

भला याद करूँ भी क्यों नहीं?!!..
तुम मेरे रूह में इस कदर समा गई थी, हमबिस्तर बन के। तुम्हारी जरा सी भी आहत मुझे बेचैन कर देती थी और मैं खोजने लगता था विकल होके, और तुम कही छुप जाती थी और हाँ...!!
मिलती कहाँ थी, आसानी से ....

असल में तुम्हारा और मेरा खून का रिश्ता जो ठहरा।

तुम्हारे छोटे छोटे दाँतो की काटी हुई चुभन का तो मैं मुरीद हो गया था !!, जहाँ भी काटती,,,, वहाँ का दाग भी कितना भयानक होता और ऐसे दाग को लोगों से छुपाना पड़ता वरना मेरी खिल्ली उड़ जाती।

पता हैं एक बार घर जो गया था। तुम्हारे शातिर बदमाशी को देखकर घर वाले भी हैरान थे। लाल-लाल के चकते जो इतने खतरनाक दिख रहे थे। जो जख्म हरे थे वे दवा लगाने के बाद भी जल्दी से ठीक नहीं हुए।

ख़ैर अभी कुछ चैन हैं जबसे चारपाई बदली हुई हैं।

#""खटमल की याद में""#

Monday, 9 April 2018

!! रूह संवाद!!

कहते हैं!!"
वक़्त गतिमान हैं।
यह अटल और शाश्वत हैं।
बदलता वक़्त घावों को तो भर सकता हैं पर,
उनका क्या जो जलते हैं बिन बाती के ज़रा-जरा-सा।

उमड़ पड़ते हैं ख्वाबों तले
मचल उठते हैं उन लहरों-सा
जो एक मिलन की आस में
उछल पड़ती हैं उन आसमाँ की ओर....
पर होता नहीं नसीब। फिर क्यों?

निकल पड़ते हैं अश्क़,
तोड़ सारे बाँधो का किनारा,
उम्मीद ही न बनता हैं सहारा,
क्या यही होने का अहसास हैं,

झुठलाती हैं वो कहकर...

"नहीं तो !!"

शायद ये गलतफहमी हैं तुम्हारी।

हाँ!! , मैं भी ठहरा एक जिद्दी,
न रुकने वाला,न थकने वाला,
वक़्त जख्मों को भर सकता हैं
पर ज़रूरी नहीं हर मर्ज की दवा ही हो।

कुछ मर्ज की दवा खुद खुदा बनाता।

"बोला:- .....
सुनो!!

दावाग्नि में जले उपवन में पत्ते पल्लवित हो सकते हैं पर
मुखाग्नि के स्वर से कभी अनुराग पैदा नहीं हो सकता।

Friday, 6 April 2018

क्रिप्टो-करेंसी क्या हैं?

क्रिप्टो करेंसी एक आभासी मुद्रा हैं जिसे ऑनलाइन मुद्रा भी कहते हैं। जिस तरह से रुपये-पैसों को रखने के लिए हम जेब (पर्स) का इस्तेमाल करते हैं, ठीक इसी प्रकार से क्रिप्टो करेंसी रखने के लिए डिजिटल जेब की जरूरत पड़ती हैं।

प्राचीन समय में लोग मुद्राओं से अनजान थे। वे अपना काम वस्तु विनिमय प्रणाली के माध्यम से चलाते थे। इसका मतलब किसी जरूरत वाली वस्तु के बदले में किसी दूसरी वस्तु बदले में देनी पड़ती थी ।

विनिमय के तौर तरीकों में बदलाव हुआ। कालान्तर में  अलग-अलग राजवंशों ने अलग-अलग अपनी मुद्राएं जारी की। किसी ने सोने के सिक्के चलाये तो वही दूसरे किसी ने चांदी, फिर ताँबा आदि का.....

क्रिप्टोकरेंसी की शुरुआत 21 सदी मानी जाती हैं। क्रिप्टोकरेन्सी में बिटकॉइन को अर्थव्यवस्था का बादशाह माना जाता हैं। इसका आविष्कार 03 जनवरी 2009 में सतोषी नाकामोतो ने किया था जो अब तक अज्ञात हैं। इस व्यक्ति की पहचान अब तक नहीं हो पाई हैं । बिटकॉइन बनाने का असली मतलब था डिजिटल मुद्रा को बिना किसी तीसरे माध्यम के यानी बिना बैंक गए ही एक-दूसरे में पैसे का विनिमय हो सके ।

आज से ठीक पांच साल पहले
1 बिटकॉइन = 5 रुपये था जबकि अभी
1 बिटकॉइन= 50 हजार से भी ऊपर हैं।
( आंकड़े घटते-बढ़ते रहते हैं)

क्रिप्टोकरेंसी के दो प्रकार हैं।

1) फिएट क्रिप्टो
2) नॉन-फिएट क्रिप्टो

फिएट क्रिप्टो वैसी करेंसी हैं जिसे स्थानीय सरकार ( जैसे की भारत में भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा मान्यता दी जाती हैं) द्वारा वैध करार दी जाती हैं।

नॉन-फिएट क्रिप्टो करेंसी निजी करेंसी होती हैं। इसमें किसी सरकार हस्तक्षेप नहीं होता और अलग-अलग देशों में कही इसकी मान्यता मिलती हैं तो कही नहीं भी।

कुछ लोकप्रिय क्रिप्टोकरेंसियाँ हैं।
बिटकॉइन, एंथ्राल, रिप्पल आदि ।

क्रिप्टोकरेन्सी के फ़ायदे:-

1) यह उच्चतम सुरक्षा मानक  हैं और यह आपकी जानकारी को गुप्त रखता हैं।
2) इससे लेन देन में किसी तरह की फ्राडगिरी  नहीं होती।
3) लेन देन के लिए किसी बैंक या कोई और माध्यम नहीं बनता।
4) इसकी फीस काफी कम होती हैं।
5) इसका खाता घर बैठे खुल जाता हैं। कोई भागदौड़ या ज्यादा दस्तावेज की जरूरत नहीं होती ।

साभार:- इंटरनेट महोदय!!

Monday, 19 March 2018

ललकी गमछी

#ललकी_गमछी
●●●●●●●●●●
ललकी गमछी बड़ी काम की
ख्याति इसकी गजब नाम की।
सर पे रखो तो ताज हैं,
समाज का मान-मरजाद है।
गले में रखो तो हार हैं,
भोजपुरिहा का उपहार हैं ।
बोझ सहने में सहायक हैं,
सुखद, सहज और लायक हैं ।
कमर में बाँधों कमरबंद बनती हैं
फुरती, साहस और जुनून भरती हैं ।
नहाने के बाद मुख्य जरूरत हैं,
सोचो इसकी कितनी अहमियत हैं ।
ज़ख्म को बाँधने में सहायक हैं,
बोझ बाँधने में भी एकदम लायक हैं ।
         
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sujit1992.blogspot.com

Friday, 9 March 2018

एक यात्रा ऐसा भी ।

#एक_यात्रा_ऐसा_भी

आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो  से जाने  का नहीं  था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।

बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते,  चलना है  क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!

मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।

हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।

रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?

अवाक हुआ  इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।

याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?

दिये निकाला  रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।

वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।

एक यात्रा ऐसा भी ।

#एक_यात्रा_ऐसा_भी

आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो  से जाने  का नहीं  था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।

बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते,  चलना है  क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!

मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।

हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।

रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?

अवाक हुआ  इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।

याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?

दिये निकाला  रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।

वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।

Wednesday, 7 March 2018

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस ।

मैं नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।

मैं जन्म की जननी हूँ,
पालन करती हुँ, पोषण करती हूँ,
भूखे तन को तृप्त करती हूँ तन से ।
रोते हुए बच्चे को गले लगाती हुँ,
सर सहलाती हुँ,आँचल का अम्बर बनाती हुँ
लोरिया सुनाती हुँ खुद जग-जगकर ।
मैं एक नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
जिस घर में पैदा लेती हूँ,
बोझ बनती हुँ, बिन भविष्य के सुन,
सहती हुँ हर चिर-वियोग और ताने-बाने
आजाद नहीं इस खगोल पर
चौखट के अंदर सब सहती हुँ,
रीति-रिवाजों की कड़ियों से बंधी सुलगती
मैं एक नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
किसी ने मेरी अस्मिता लूटी
देख उसे किसी ने त्याग किया
पत्थर शिला को देख किसी ने उद्धार किया
बस यही मेरी कहानी है ।
अब देर नहीं, सबेर नहीं
तोड़ूंगी हर बंधन को मैं
नित नए रूप दिखाउँगी 
दैत्यों को सबक सिखाऊँगी
मैं नारी हुँ!
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।

Sunday, 4 March 2018

दो राजधानियों की प्रेम कहानी ♥️👇👇

दो राजधानियों की प्रेम ♥️ कहानी
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यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है. क़िरदार की भूमिका कहानी से अगर कुछेक अंश भी मिलती हैं तो लेखक को बड़ी खुशी होगी ।

ख्वाबों की दुनिया में चलते हुए अगर कदमों की चाल हकीकत में तब्दील होने लगे। नींबू जैसा मन पपीता की तरह पीला और बड़ा होने लगे तो वही अहसास है प्यार का.... 

वक़्त नदी है, दोनों छोर क्रमशः किनारे का रूप हकीकत और ख़्वाब होते है। एक छोर से दूसरे छोर के बीच उम्मीदों का बांध बाँध तो सकते है पर टिकना संभव कहाँ?

दरअसल यह कहानी दो जीव, दो दिल, दो जिस्म या दो जिंदा दिली प्रेमी-प्रेमिका का ही नहीं है अपितु दो राजधानियों का मिलन है। दिल्ली हमारे देश की राजधानी हैं और लखनऊ भी यूपी की। आज यही दो राजधानियों के बेमेल दो दिलों की हाल-ए-दास्तां सुनाता हूँ ।
कहते है कि किसी प्यार किसी धर्म, सम्प्रदाय, बड़ा-छोटा,कृत-विकृत या गोरा-काला में विभेद नहीं करता, यह तो एक जादू है जो एहसासों के तवे पर पकना शुरू होता है और पकते-पकते किसी का उतर जाता है या किसी को जीवन भर पकाता है।
##

संगीत की दुनिया अजीब है दोस्तों। क्या खूब अपनी आवाज से दिल तक अपनी बातों को मनवाने लगता है, लोकतांत्रिक देशों में भी एक अलग सा साम्राज्य स्थापित करने के सपनें सजाने लगता है। जैसे कि मैं उसके दिल का राजा होता, वो हरपल मेरे बारे में सोचती रहती और मैं उसके। जब इश्क़ का सुरूर चढ़ता है तो सोचने का पैमाना लुल हो जाता है ।

याद करा दूँ, दिल्ली का इतिहास बहुत पुराना और दिलचस्प है । इसका उल्लेख महाभारत काल में हुआ है जब हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र ने पांड्वो को इसी के आसपास का क्षेत्र दिया था, तब वे इस नगर को बसाये थे और इन्द्रप्रस्थ नाम दिए थे।  कालान्तर में इसकी गरिमा दिल्ली सल्तनत के नाम हुई, परंतु यह अभिशाप रहा इसकी बागडोर बदलती रही। कहते है, यहाँ की भूमि रक्त से सिंचित है। सत्ता की लालच लिए लाखों लोगों की बलि बनी यह धरा.... हम तो दिल्ली को मिर्जा ग़ालिब के शहर  से जानते है। जो इस शहर को शायरी की दुनिया से रूबरू कराया, हर नौजवानों की जुबां इनकी अभी भी पकड़ है।

नदी का दूसरा छोर, लखनऊ भी अपने अतीत काल से ही विख्यात रहा है। प्राचीन कोसल राज्य, जो भगवान राम के अधीन था, को लक्ष्मण जी को समर्पित किये थे और लक्ष्मणपुर  से नाम बदलकर लखनऊ बना । यह नबाबों का शहर है, नवाब आसफ़ुद्दौला ने इसे समृद्ध किया। यह शहर  चिकन कढ़ी, और आम उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के मशहूर शायर मजाज लखनबी, मात्र 44 साल धरा पे रहकर अपने शायरी में जो अद्वितीय प्रसिद्धि पाई वो उल्लेखनीय है ।  कवि कुमार विश्वास जी कहते है कि इनकी लिखी किताब उस समय  एक दिन के लिये ही खास खास लोगो को मिलती थी, तब आज के जैसा युग नहीं था, वरन कॉपी पेस्ट मारकर घर-घर मे सैकड़ो प्रतियां होती ।

@@
अरे, हम असली कहानी तो भूल गये थे।
जैसा की ऊपर बताया दोनो शहर महाभारत और रामायण का हिस्सा रहा है, उसी तरह दोनों राजधानियों की प्रेम कहानी भी बिल्कुल माधुर्यता, सम्मोहक, और उत्कटपूर्ण है ।

रविआ की जिंदगी भी कुछ इसी कदर गुजर रही थी। नये सपनें थे, नई उमंगे थी और पहली बार असल प्यार की जिंदगी में जीने अहसास हुआ था। पिछले एक महीना से न तो खाना-पीना नीक लग रहा था और न ही नींद आ रहा था, बस मोबाइल में पता नहीं क्या क्या टिप-टॉप करते रहता । दिल्ली में रहकर यूपीएससी की तैयारी करने वाला रबी होली में घर आया। परिवार वाले बहुत खुश थे, गाँव के लड़के भी खुश थे कि होली खेलने वाला दोस्त घर आया है।  रबी की आधी रात तन्हाई में गुजर रहा था। मन की हिलोरें झोंके से चलती फिर एकाएक शांत हो जाती। होली के दिन वो घर में ही दुबके रहा और मोबाइल में ही लगा रहा। दादी को लग रहा था कि आज कल की डिजिटल इंडिया में पढ़ाई की वजह से मोबाइल पर ही पढ़ रहा होगा। मोबाइल की पढ़ाई में तल्लीन देखकर पूरे घर वाले आस लगाए है कि रबिया कोई अच्छा जॉब पकड़ेगा।
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रवि अपने कोचिंग का सबसे टॉपर लड़का है। हर सवाल को बखूबी सॉल्व कर देता, लूसेन्ट तो मुंहजबानी याद है। लेकिन इस बीच दो महीना के लिए आई पूर्णिमा की नजर रबि पर पड़ी, फिर क्या था । नजर की नजाकत ने ऐसा नजरिया बदला की नजरें बदल गई।
दो महीना दो दिन की तरह गुजरा, बीसवें दिन एक दूसरे की निगाहें नाज़िर हुई और सप्ताह में पाँच दिन का क्लास शनि, रवि की छुट्टी,गई तो गई, पर छीन गई सुनहले सपनें, आंख का सूकून, तन का चैन और एक पहाड़ सा दर्द का मंज़र..........
छोड़ गई वो पिंक हेयर क्लिप जो पीछे से दूसरे बेंच से  एक पराबैगनी किरणें निकलकर आ रही थी, जो सिर्फ उसे ही आकर दिखती और उसकी बात बात पर अवरोध करने वाली बीमारी ..असल में वो बीमारी नहीं थी, वही तो था सुकून देने वाला पल, कलेजे को ठंडक पहुँचाने वाली आवाज और नटखटी निराली अंदाज़ जिसे सुनकर ऐसा महसूस होता जैसे राजस्थान के मरुस्थल में बाढ़ आ गया है, मरुस्थल में मरे घास-पात, पेड़ पौधे अब जी गए है, ठूठ शिरीष और बबूल के पेड़ो में भी हरियाली आ गई हो!

वो बीता हुआ शुक्रवार का शूकर है जिंदगी भर याद रहेगी, उस मिरजई आंखें और वह अदा जिसका शिकार था रवि।  जब एक हल्की मुस्कान के साथ रास्ते से गुज़री और बोली...

Hi,,, ravi
How r u????
Meet me after class......

रवि के चेहरे से तो अवरक्त किरणें निकल रही थी, जो छन में सबको जलाकर प्यार की एक जिंदगी जीने का मजबूर कर रही थी। उसकी पिंक जूतियाँ, पिंक टीशर्ट और पिंक हेयर क्लिप जिसकी त्रिविमीय किरणों से बने केंद्र उसकी आँख थी, रेखा खण्ड को कितने डिग्री का कोण बना रही है, सोचने में डूब गया ।

क्लास खत्म होने के बाद मिनट भर के लिए भेंट हुआ । हाथों से हाथ इस तरह कस के पकड़ा जैसे कि इसकी छुअन जिंदगी भर भूले नहीं, फिर क्या था, कमीने दोस्तो ने आवाज लगा दी। रबी का मुंह पूरी तरह लाल हो चुका था। खरबूजे का पकना भला कौन नहीं पहचाने।  बस क्या था, उसी दिन से इश्क़ में गिरफ्तार हुआ,अब कैदी बना चुका था। हर सोच पूर्णिमा से ही शुरू और खत्म हो जाती । वो उसके जाने का दिन था पर कमीने दोस्तों की वजह से ठीक से नहीं मिल पाया था । 10 दिन बाद ट्विटर अकाउंट पर एक फॉलो आया, देखा तो लिखा था,
Purnima Sharma follow u.......
आगे के लिए थोड़ा इंतज़ार करें
मन का राही
गोप भरौली, बक्सर

Wednesday, 28 February 2018

बसन्ती बयार ~ हैप्पी होली ♥️♥️

एक छोटा सा गाँव है।
गोप भरौली, सिमरी,बक्सर....जहाँ की आबादी है लगभग 1200, कुछ नए आने वाले मेहमानों को छोड़कर ... भले ही इस बार वेलेंटाइन-डे खूब मना है। कुछ नई शादियां भी हुई है, अनुमानों के आंकड़े  कुछ इधर-उधर हो सकते है। हाँ, ..इतना जरूर कहूँगा की इस बार की ठंडी में गाँव के बुजुर्गों का स्वास्थ्य अच्छा रहा, पूड़ी नहीं दिये...... ईश्वर करें! इसी तरह स्वस्थ, सुखी और परिवार का मार्गदर्शन करते रहें।
जैसा कि सर्वविदित है, हर किसी का बचपन पूरे जीवन रूपी कालखण्ड से प्यारा, अनोखा और खूबसूरत होता है। मेरा भी अच्छा चल रहा था। मुझे बचपन के हर किस्से हुबहू तो याद नहीं, पर कुछ ऐसे जो अभी तक दिल में दस्तक जमाये हुए है, अच्छी तरह से याद है .......
बंसन्त का महीना चल रहा था । शाम के समय में वातावरण में नमी था..ना ज्यादा गर्मी और ना ही ज्यादा सर्दी ...जैसा कि हर बंसन्त में होता है। अभी घंटे भर पहले रवि अस्त हुए थे... शशि अभी अपने क़ायनात से बाहर भी नहीं हुए थे। कहते है कि रवि और शशि एक साथ अपना प्रभाव नहीं दिखाते, लेकिन गांव में रवि और शशि की दोस्ती बेमिसाल थी,जहाँ निकलते साथ ही निकलते। हालाँकि की आजकल सुलभ घर घर बन जाने से लोगों का बाहर लोटा लेकर निकलने की प्रथा कम हुई है। नहीं तो पुरुब टोला से पछिम टोला गाँव के बाहर से ही सीटी संकेतक होता। जो पहले निकलता एक सीटी मार देता,मंद मंद पुरुआ हवा बह रही थी ।

हम अभी अपने पुराने वाले ही घर थे। जहाँ से आज भी बड़े बुजुर्गों, पड़ोस के भईया, चाचा-चाची, रंगीला काका, बटेशर जादो और दर्जनों भर लोगों के साथ बिताये सावन भादों की यादें जीवंत है। दुआर पर कुछ गेंदा, गुलाब, अड़हुल के पेड़ों से ख़ुशबू निकलकर वातावरण को सुवासित कर रहा था।

स्कूल से आने के बाद चुपके से 80 की रफ्तार में खरिहान में निकल पड़ते थे, खेल के आगे खाने-पीने की कोई सुध नहीं रहती थी। भले ही खेलकर आने के बाद घर वालों की डांट फटकार लगती रहे। खरिहान एक ऐसा जगह था, अभी भी है पर इसका क्षेत्रफल आधुनिक तकनीकी की मार की वजह से कम होते जा रहा है।  शाम को लड़को का क्रीड़ा केंद्र होता। गुल्ली डंडा, कबड्डी, घोंडा  बैठने वाला खेल आदि, तब आज के जैसा मोबाइल गेम नहीं था, आजकल मोबाइल से ही शारीरिक खेल रूप सभी क्रियाएं हो जाता है, अच्छी बात है । अगर उस समय जिओ का अनलिमिटेड प्लान चलता तो हमारे जैसे लोगों का हालात तो और भी  बद से भी बदतर हो जाता। क्यों सोशल मीडिया का ऐसा  भूत सवार है कि रात के सुबह 5 बजे से रात के 1 बजे तक अपने साये में दबाके रखता है ।

उस समय हमारे गुरु जी स्व श्री सीताराम पाण्डेय जी  साठ बरस उम्र रही होगी और हमलोग वही चौथी, पाँचवी के विद्यार्थी रहे होंगे। तकरीबन दो दशक गुजर जाने के बाद याददाश्त भी अब पहले जैसी नहीं रहीं। समय विकास का बहुत तरक्की किया है।  एक तरह आलू से सोना निकल रहा तो दूसरी तरह हेरा-फेरी नहीं हीरा-फेरी चल रही है । आज कल के विद्यार्थियों का यादाश्त एक दशक भी चल जाये तो कहना मुश्किल ही होगा ।

हर साँझ खेलकुद करने के बाद घर आकर घर वालों से  डाँट फटकार सुनना आदत में शुमार हो गया था। जैसे
1.ई लइका के पैर में शनिचर का बास हो गया है, एक छन भी घर में रहा नही जाता, जब भी टाइम मिलता है, भाग जाता है खलिहान में । ऐसा लगता है इसका चूरूकी वही गड़ा गाया है ।
2.घर के काम को काम नहीं समझता है जब देखो सोनुआ आ अंकितवा के साथ दुम दबा के निकल पड़ता है ।
3. रविवार के दिन छुट्टी होने से बाकी दिन की अपेक्षा डोज कुछ ज्यादा ही मिलता था, पर घर वालों को भी मालूम होता कि लड़का आ बानर में ज्यादा समझ नहीं होता, हॉ इतना जरूर होता कि कभी कभी दो चार झाप लगने के बाद गंगा जमुना की निर्मल धारा प्रवाहित हो जाती  और अगले कुछ घंटे में सब कुछ ठीक हो जाता, खैर"" आजकल के लड़के कुछ ज्यादा ही सीरियस में ले लेते है ।

स्कूल में जाते समय घर से दो तीन रुपये मिलता था जिसमें खर्च करने का मैनेजमेंट MBA के छात्रों से भी ज्यादा दिमाग खपाना पड़ता। 1 रुपये में चार मोटन चाकलेट लेकिन आदमी तो 6 है दाँत से काट कर वितरण करने वाली प्रथा हूबहू याद है और रास्ते मे पड़ने वाले जुताई हुए खेतों के ढेलों से बड़ा चट्टान बनाना, कुछ बिस्कुट और चॉकलेट के टुकड़ों को पंडुक बाबा(पक्षी) और चूहे भगवान या खाने से बरहम बाबा के नाम पर छुपा के रखने अगले सुबह आकर उसे उकेर कर देखना है। बिस्कुट या चाकलेट का टुकड़ा न पाकर भगवान के प्रति आस्तिकता के भाव मे शरधा से सर झुकाना आम बात थी ।

हाँ, मैं तो बसन्त वाली बात तो भूल ही चुका था। गुरु जी अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत अधिक सचेत थे। ठंड में भले आजकल हम गरम पानी पीकर फिटनेस और सेप बनाने, डाइजेशन ठीक करने और हार्ट अटैक से बचने में यूज करने लगे है पर वे उस समय गर्म पानी साथ लेकर चलते थे।

कल रविवार था इसलिए पूरा दिन घूमने-फिरने और शक्तिमान देखने व दोस्तो के साथ घूमने में निकल गया था । टास्क में  गुरु जी ने 20 तक पहाड़ा याद करने के लिए दिए थे, पर मेरी पहाड़ा रूपी गाड़ी की रफ्तार पाँचवे पायदान तक जाकर खड़ी हो जाती, 17, 18 और 19 ये तीनों महाकवि  कालिदास जी के महाकाव्य अभिज्ञानशाकुन्तलम और आचार्य द्विवेदी जी के हिंदी साहित्य काल से भी भारी था।

गुरु जी मेरी दिमाग रूपी गाड़ी में पेट्रोल डालते डालते थक
चुके थे, यदाकदा एक दो छड़ी गुस्से में लगा भी देते पर इसकी ग्लानि उन्हें ही होती,  इसका कोई खास फायदा न पाकर एक नई तरकीब निकाल दिए ।

ये एक शर्त थी ।
शर्त ये थी कि फागुन का महीना चल रहा है और उस समय शादी का लगन बहुत ज्यादा था। वे बोले, मैंने तुम्हारे लिए एक ख़ूबसुनदर लड़की भी ढूंढ़ रखी है। उसके मम्मी-पापा भी शादी के लिए लड़का खोज रहे है लेकिन उनका कहना है कि जो लड़का 20 तक पहाड़ा याद कर लेगा उसी से अपनी लड़की का शादी करेंगे। शर्त मेरे दिमाग में एक घर कर गया और दिमाग में एक नई दुनिया जीने के लिए प्रेरित कर रहा था। बचपन की बचपना में दूल्हे के साथ छोटा लड़का (सहबाला ) का भी तेवर सातवें आसमान पर रहता है ।

अन्त में मैंने 20 तक पहाड़ा तो याद कर लिया पर, चूक हो गया, खाली पड़ गई मेरे सपने की अहसास, एक ऐसा बंसन्त जिसे मैंने 15 साल पहले सपनों की दुनिया मे सजाया करता था। असली गुरु वही होता है जो बच्चों की बचपना समझता है।

खैर,  गुरु जी नहीं रहे!  इसका बहुत पछतावा है। इस बार की होली मैं अपने स्व गुरु जी को समर्पित करता हूँ। वे जहाँ भी हों, जिस रूप में भी हों, हमारी शुभकामना उन तक पहुँचे । एक और खेद है इस होली मैं अपने घर भी नहीं रह पा रहा हुँ, ग्लानि तो है। आप सभी मित्रों को होली की हार्दिक शुभकामना।
रंग भरे इस होली में जम के ख़ुशी मनायें
दुश्मनी   को छोड़  सबको   गले  लगायें ।
कुछ रंग लगाएं और कुछ गुलाल  लगायें
अपना छोड़ औरों के घर का फुआ खायें।।
HAPPY HOLI ♥️✍️ SE .............

सुजीत पाण्डेय छोटू
गोप भरौली, सिमरी, बक्सर ।।


Wednesday, 7 February 2018

अल्फाज़

वक़्त के पन्ने पलटे तो अचानक ख्याल आया
खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ?

बहुत देर लगी खुद को समेटते समेटते
यादों की रेत हवा में ठहर कैसे गई ?

तन्हाइयों के कफन में बंधा है ये जिस्म
मैं तो मिट्टी नही थीं, बिखर कैसे गई ?

हर पल कतरा कतरा मारा था जिसे उम्र भर
अपनी वो लाश पहचानने से आज मुकर कैसे गई ?

बेदम बेजान आरजूओं के जनाजे देखे थे कई
अपनी ही कब्र देखी तो सिहर कैसे गई ?

खुद से कभी पूछा ही नहीं तुम गुजर कैसे गई ??

-----    पूर्वा अग्रवाल