Thursday, 13 December 2018
चुनाव
Monday, 5 November 2018
शुभ दिवाली
Thursday, 20 September 2018
माँ की ममता
आज दूसरा दिन था.. मां बेहद आहत थी और उसे ऐसा लग रहा था कि बच्चा आँख खोल देगा...
गाड़ियों को आना-जाना लगा हुआ था. बगल के पुल पर और भी बहुत से बंदर देख रहे थे, उनकी आँखे भी गीली थी और मन में एक ही पच्छताप हो रहा था. हम क्यों बच्चे को लेकर इस रास्ते से गुजरे.
माँ अपने बेटे को जोर-जोर से झकझोरती और पुनः उठाने के लिये उसकी आँखें खोलती पर आँखे तो सदा के लिए बंद हो चुकी थी. कभी उसे दुलारती कभी पुचकारती तो कभी-कभी केले के टुकड़े को उसके मुँह तक ले जाती पर नहीं खाने पर गले लगाती और ऐसा लग रहा था कि वो पूछना चाहती हैं " क्यों नहीं खा रहे हो?. कभी उसके बालों में से जुयें को निकालती और उसे खा लेती..
आने जाने वाले वे लोग जो पैदल या साइकिल से गुजरते और कुछ मिनट के लिए ऐसी घटना को देखकर भावुक हो जाते और यहाँ तक कि किसी- किसी के आँखों से आँसू भी निकल आते और उन्हें याद आती " माँ की ममता...
बीस घंटे गुजर चुके थे.और बंदरिया अपने बच्चे से बिल्कुल अलग नहीं हो रही थी. न उसे खाना की फिकर थी और न प्यास लग रही थी, बस उसे अपने बच्चे को काल के गाल से खींचने की आस लगी थी. शायद उस समय उसे खुद का भी प्राण त्यागने में भी कोई ग्लानि महसूस नहीं होती!
अन्त में देखा गया कि बंदरों की झुंड से एक बूढ़ा बंदर निकला, ऐसा लग रहा था वो उनलोगों का शायद मुखिया हो और एक दो उसके सम उम्र बंदर उसके पास गये और कुछ देर वहाँ बैठकर कुछ आपस मे बात करने लगे. शायद वो जीवन-मृत्यु के रहस्य और सहानुभूति प्रकट करा रहे थे.
दस मिनट बाद अब धीरे धीरे बाकी बन्दर भी इकठ्ठा होने लगे और उस बनदरिया को साथ लेकर चले गए. जाने के क्रम में बंदरिया बार बार पीछे मुड़कर देखती पर असहाय हो पैर आगे बढ़ा लेती..
{ कृपया सड़क पर चलते समय ध्यान रखें, मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों के भी परिवार होते हैं। सुख- दुःख की अनुभूति उन्हें भी होती हैं}
@सुजीत, बक्सर.
Friday, 7 September 2018
बरसात
Wednesday, 29 August 2018
ग्रामीण परिदृश्य " भाग - 1"
Wednesday, 25 July 2018
हाँ, मैं दिल्ली में रहता हूँ!
हाँ, मैं दिल्ली में रहता हूँ।
************************
सिंगल रूम का कमरा हैं,
उसी में सब कुछ करना हैं,
रहना, खाना, पीना, सोना,
पांच हजार जिसका भरना हैं।
हाँ, मैं दिल्ली में रहता हूँ ।
बीबी को शहर घुमाया नहीं,
कोई मॉल-वॉल दिखाया नहीं,
बच्चे का एडमिशन कराया नहीं,
घर खर्च भी पूरा हुआ नहीं।
हाँ, मैं दिल्ली में रहता हूँ!
जब दोस्त कोई भी आता हैं,
फ़ोन करके बतियाता हैं,
कहता हैं अबे तू कहाँ हैं?
मिलता नहीं,रहता कहाँ हैं?
हाँ, मैं दिल्ली में रहता हूँ।
एक नौकरी के बाद दूसरी,
सोचता हूँ, कर लूँ तीसरी,
घर खर्च बमुश्किल चलता हैं,
जैसे- तैसे दिन कटता हैं।
हाँ, मैं दिल्ली में रहता हूँ।
अभी महीना लगा नहीं,
मालिक आ धमकता हैं,
अब बकाया खत्म कर दो,
राशन वाला भी कहता हैं।
हाँ, मैं दिल्ली में रहता हूँ।
घरवाले भी आस लगाते हैं,
इस बार होली अच्छी होगी,
बेटा जब दिल्ली से आयेगा,
सबको कपड़ा सिलवायेगा।
हाँ, मैं दिल्ली में रहता हूँ।
:- सु जीत पाण्डेय "छोटू"
Monday, 14 May 2018
एक चर्चा :- बाबा नागार्जुन की
बेशर्मी की हद हैं फिर भी बातें बड़ी बनाते हैं।"
"जिस आदमी को बहत्तर चूल्हे का खाना लगा हो वह एक घर में कहाँ टिक पाता हैं।"
1. आओ रानी हम ढोएंगे पालकी
2. शासन की बंदूक
1. गुलाबी चूड़ियाँ
2.लच्छो की अम्मा
3.मेरी नवजात सखी
1. वसंत की आगवानी
2. नीम की दो टहनियां
3. शरद पूर्णिमा
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पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा
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कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।
Sunday, 6 May 2018
..इसीलिये अरेंज वाली नहीं टूटती हैं शादियां!!
इसीलिये अरेंज वाली नहीं टूटती हैं शादियाँ!!
....................................................................
शादी एक ऐसा बंधन हैं जिसमें लड़का-लड़की एक दूसरे के सुख दुख में शरीक होने का प्रण लेते हैं।
論
में खाना खाने का प्रबंध होता हैं सबको खाना परोसा जाता हैं लेकिन दूल्हा खाता नहीं हैं वो जाता हैं .........',"रूस"
हालांकि यह रोने वाला रस्म धीरे धीरे विलुप्त होते जा रही हैं।
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बक्सर
Saturday, 5 May 2018
Walled city (वाल्ड सिटी) क्या हैं??
दिल्ली में लगभग ग्यारह सौ चालीस दिन गुजारने के बाद भी यहाँ की वाल्ड सिटी के बारे में नहीं जान सका, आज सुबह सुबह मेरी नजर चावड़ी बाजार के एक साइन बोर्ड पर पड़ी, जिसपर लिखा था...
*" वाल्ड सिटी में आपका स्वागत हैं।"
ताज्जुब हुआ इतना दिन ये बोर्ड तो दिखा नहीं, आज कैसे दिख गया किन्तु वहाँ से गुजरते वक़्त या तो जल्दबाजी रहती हैं या इतनी भीड़भाड़ रहती हैं कि खुद को ऑटो रिक्शे, टेम्पू, और अन्य गाड़ियों से बीच बचते बचते निकलने की वजह से नहीं दिखा होगा।
दिल्ली के कुछ खास जगहों को वाल्ड सिटी के नाम से जाना जाता हैं। वाल्ड सिटी में मुख्यतः पुरानी दिल्ली के चांदनी और चावड़ी बाजार का एरिया आता हैं और इसका केंद्रीय बिंदु लाल किला हैं। लाल किला से निकलने वाले रास्ते मुख्य सड़क हैं। लाल किला के ठीक तीनों तरह का समानांतर रोड इसकी मुख्य सड़क थी।
कहते हैं कि पुरानी दिल्ली को मुगल शासक शाहजहां ने सन सोलह सौ उनतालीस में बसाया था और इसे राजधानी बनाकर नाम दिया था "शाहजहाँबाद"....!
उस समय यह शाहजहाँबाद का एरिया पूरी तरह चाक चौबंद था और पूरी तरह से घेराबंदी कर 14 गेटों से सील्ड था। ये गेट रात के समय बंद कर दिए जाते थे और पहरेदार लगाए जाते थे । यह एरिया पंद्रह सौ एकड़ यानी लगभग 6.1 km में बसा हुआ था। कुछ मुख्य गेट नीचे दिए गए हैं....
1. कश्मीरी गेट:- उत्तर दिशा
2. मोरी गेट। :- उत्तर दिशा
3. निगमबोध गेट:- उत्तरपूर्व दिशा
4. लाहौरी गेट:- पच्छिम दिशा
5. अजमेरी गेट:- दक्षिण पूर्व दिशा
6. तुर्कमानी गेट:- दक्षिण पूर्व दिशा
7. दिल्ली गेट:-दक्षिण दिशा
8. काबुली गेट:- पश्चिम दिशा
9. खूनी दरवाजा:- इसका निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया था ।
इन दरवाजों के चारों तरफ की ऊँचाई लगभग 26 फ़ीट की बनाईं गई थी, और मुख्य दरवाजे की ऊंचाई 26 फ़ीट थी,जो लाल पत्थर से बना हुआ था।
कहते हैं कि कश्मीरी गेट से होते हुए जो सड़क हैं वो कश्मीर को जाता था इसलिए ही इसका नाम कश्मीरी गेट पड़ा और निगमबोध का द्वार जो अब निगमबोध घाट हैं जहाँ अब दाह संस्कार किया जाता हैं।
इसका बहुधा भाग सन 1857 में हुए विद्रोह में तोड़कर गार्डन वैगेरह बना दिया गया। कुछ गेट अभी भी विरासत के रूप में टूटे-फूटे हैं।
[वाल्ड सिटी को देखकर मन में इसके बारे में जानने की इच्छा हुई, उक्त सभी जानकारियाँ गूगल बाबा से प्राप्त की गई हैं]
Thursday, 3 May 2018
!! मेरी रूह !!
* मेरी रूह *
मेरी रूह बसती है उस दुवार पर,
जहाँ रोज सुबह के आठ बजे सुकुरती डेरा डालती है। और जब वो पूँछ हिलाते हुए पहुँचती है, तो माँ कहती है
"जा एगो रोटी दे दऽ, बेचारी भूखाइल होई"
मेरी रूह बसती है उस घर में,
जहाँ पेट भरने के बाद भी माँ जबरदस्ती अपने हाथों से ठूँस-ठूँस कर खाना खिलाते हुए कहतीीm है..
"खा ल, काहे काहे चिंताऽ करत बाड़ऽ!, तहरा कमाई के आसरा नइखे"
मेरी रूह बसती है वहाँ,
जहाँ एक गइया है जो सुबह-सुबह खाने के लिए मकई की टाटी पर पूँछ पटकती है और लेट होने पर अलार्म के तौर पर रंभाती है।
मेरी रूह बसती है उस खलिहान में,
जहाँ हम बचपन में क्रिकेट और बॉलीबाल खेलते थे। इस दौरान खेल गेंद किसी के पाथे हुए गोबर में चले जाने से उसे कचटने पर गालियाँ सुनकर हँसते थे।
"तब ना तो कोई अदब था और ना ही कोई गुरुर"
मेरी रूह बसती है ब्रह्म बाबा स्थान में,
जहाँ मेरा बचपन घोड़ा बैठने, लट्टू, गोली, चीका, कबड्डी खेलने में गुज़रा। वहाँ जब बारिस होती, तो बेंग की आवाज सुनने के लिए टाइम निकाल लेते और फुरसत से कागज की नाव बनाते।
" पूरे गाँव का आस्था और भक्ति का केन्द्र है"
मेरी रूह बसती है उस आँगन में,
जहाँ होली के दिन पंकजवा भाँग खाके अपना भउजी पर रंग से जादा गोबर उड़ेलकर होली खेलता था।
"तब ना आपस में बैर था, न कोई आशंका"
मेरी रूह बसती हैं मेरे गाँव गोप भरौली,सिमरी,बक्सर में,
जहाँ कोई आलीशान बिल्डिंग नहीं हैं,
गुजर-बसर करने लायक कुछ कच्चे-पक्के-करकट-माटी के मकान, जिन तक अभी पक्की सड़क नहीं पहुँची है, सुना है वो कहीं रास्ते में हैं
" पर बसता वहाँ सुकून हैं"
:- सुजीत पाण्डेय छोटू
【विशेष आभार:- Sri Krishna Jee Pandey】
Saturday, 14 April 2018
सतुआ न ।🍒🍎
अभी स्कूल की छुट्टी भी नहीं हुई थी। एक घंटी बाकी था तब तक सोनुआ आकर बोला।
आज सतुआनी ह, ई साल ख़ालिये जाई का ।
हम क्लास में दूसरे बेंच पर बैठे हुए ही तिरछी आँखों से पीछे देख रहे थे। पीछे चल रही साज़िश किसी के नव कपोल आम तोड़ने की थी। वैसे शुरू से ही चोरी में कम लेकिन चोरी में तोड़े गए सामान को बटोरने में माहिर आदमी समझता था।
....अंसारी सर बोल पड़े...
सुजीत कुमार पाण्डेय"
** पुनर्जागरण किसे कहते हैं?
मेरी तंद्रा खुली, फटाफट खड़ा हुआ। इतने देर में दूसरा सवाल जहाँ तक पूछते , बोल दिए
बेंच के ऊपर खड़ा अपनी शक्ल दिखाओ।
लजाते शर्माते हुए खड़ा हुआ और तब तक क्लास में ठहाके शिकार हुआ ।
क्या तुम क्लास में हो ?
Tuesday, 10 April 2018
"कुछ यादगार लम्हें......की!!!
""कुछ यादगार लम्हें .........की!!!!""
मुझे अच्छी तरह से याद हैं!!..
जब मैं पहली बार तुमसे मिला था! वो दिन बजट-सत्र का आखिरी दिन था और मैं पहली बार दिल्ली की जमीं पर कदम रखा था।
ना दिल में चैन था और ना मन को सुकून! हर वक़्त याद कर कर के मन विचलित और रूह परेशान था।
भला याद करूँ भी क्यों नहीं?!!..
तुम मेरे रूह में इस कदर समा गई थी, हमबिस्तर बन के। तुम्हारी जरा सी भी आहत मुझे बेचैन कर देती थी और मैं खोजने लगता था विकल होके, और तुम कही छुप जाती थी और हाँ...!!
मिलती कहाँ थी, आसानी से ....
असल में तुम्हारा और मेरा खून का रिश्ता जो ठहरा।
तुम्हारे छोटे छोटे दाँतो की काटी हुई चुभन का तो मैं मुरीद हो गया था !!, जहाँ भी काटती,,,, वहाँ का दाग भी कितना भयानक होता और ऐसे दाग को लोगों से छुपाना पड़ता वरना मेरी खिल्ली उड़ जाती।
पता हैं एक बार घर जो गया था। तुम्हारे शातिर बदमाशी को देखकर घर वाले भी हैरान थे। लाल-लाल के चकते जो इतने खतरनाक दिख रहे थे। जो जख्म हरे थे वे दवा लगाने के बाद भी जल्दी से ठीक नहीं हुए।
ख़ैर अभी कुछ चैन हैं जबसे चारपाई बदली हुई हैं।
#""खटमल की याद में""#
Monday, 9 April 2018
!! रूह संवाद!!
कहते हैं!!"
वक़्त गतिमान हैं।
यह अटल और शाश्वत हैं।
बदलता वक़्त घावों को तो भर सकता हैं पर,
उनका क्या जो जलते हैं बिन बाती के ज़रा-जरा-सा।
उमड़ पड़ते हैं ख्वाबों तले
मचल उठते हैं उन लहरों-सा
जो एक मिलन की आस में
उछल पड़ती हैं उन आसमाँ की ओर....
पर होता नहीं नसीब। फिर क्यों?
निकल पड़ते हैं अश्क़,
तोड़ सारे बाँधो का किनारा,
उम्मीद ही न बनता हैं सहारा,
क्या यही होने का अहसास हैं,
झुठलाती हैं वो कहकर...
"नहीं तो !!"
शायद ये गलतफहमी हैं तुम्हारी।
हाँ!! , मैं भी ठहरा एक जिद्दी,
न रुकने वाला,न थकने वाला,
वक़्त जख्मों को भर सकता हैं
पर ज़रूरी नहीं हर मर्ज की दवा ही हो।
कुछ मर्ज की दवा खुद खुदा बनाता।
"बोला:- .....
सुनो!!
दावाग्नि में जले उपवन में पत्ते पल्लवित हो सकते हैं पर
मुखाग्नि के स्वर से कभी अनुराग पैदा नहीं हो सकता।
Friday, 6 April 2018
क्रिप्टो-करेंसी क्या हैं?
क्रिप्टो करेंसी एक आभासी मुद्रा हैं जिसे ऑनलाइन मुद्रा भी कहते हैं। जिस तरह से रुपये-पैसों को रखने के लिए हम जेब (पर्स) का इस्तेमाल करते हैं, ठीक इसी प्रकार से क्रिप्टो करेंसी रखने के लिए डिजिटल जेब की जरूरत पड़ती हैं।
प्राचीन समय में लोग मुद्राओं से अनजान थे। वे अपना काम वस्तु विनिमय प्रणाली के माध्यम से चलाते थे। इसका मतलब किसी जरूरत वाली वस्तु के बदले में किसी दूसरी वस्तु बदले में देनी पड़ती थी ।
विनिमय के तौर तरीकों में बदलाव हुआ। कालान्तर में अलग-अलग राजवंशों ने अलग-अलग अपनी मुद्राएं जारी की। किसी ने सोने के सिक्के चलाये तो वही दूसरे किसी ने चांदी, फिर ताँबा आदि का.....
क्रिप्टोकरेंसी की शुरुआत 21 सदी मानी जाती हैं। क्रिप्टोकरेन्सी में बिटकॉइन को अर्थव्यवस्था का बादशाह माना जाता हैं। इसका आविष्कार 03 जनवरी 2009 में सतोषी नाकामोतो ने किया था जो अब तक अज्ञात हैं। इस व्यक्ति की पहचान अब तक नहीं हो पाई हैं । बिटकॉइन बनाने का असली मतलब था डिजिटल मुद्रा को बिना किसी तीसरे माध्यम के यानी बिना बैंक गए ही एक-दूसरे में पैसे का विनिमय हो सके ।
आज से ठीक पांच साल पहले
1 बिटकॉइन = 5 रुपये था जबकि अभी
1 बिटकॉइन= 50 हजार से भी ऊपर हैं।
( आंकड़े घटते-बढ़ते रहते हैं)
क्रिप्टोकरेंसी के दो प्रकार हैं।
1) फिएट क्रिप्टो
2) नॉन-फिएट क्रिप्टो
फिएट क्रिप्टो वैसी करेंसी हैं जिसे स्थानीय सरकार ( जैसे की भारत में भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा मान्यता दी जाती हैं) द्वारा वैध करार दी जाती हैं।
नॉन-फिएट क्रिप्टो करेंसी निजी करेंसी होती हैं। इसमें किसी सरकार हस्तक्षेप नहीं होता और अलग-अलग देशों में कही इसकी मान्यता मिलती हैं तो कही नहीं भी।
कुछ लोकप्रिय क्रिप्टोकरेंसियाँ हैं।
बिटकॉइन, एंथ्राल, रिप्पल आदि ।
क्रिप्टोकरेन्सी के फ़ायदे:-
1) यह उच्चतम सुरक्षा मानक हैं और यह आपकी जानकारी को गुप्त रखता हैं।
2) इससे लेन देन में किसी तरह की फ्राडगिरी नहीं होती।
3) लेन देन के लिए किसी बैंक या कोई और माध्यम नहीं बनता।
4) इसकी फीस काफी कम होती हैं।
5) इसका खाता घर बैठे खुल जाता हैं। कोई भागदौड़ या ज्यादा दस्तावेज की जरूरत नहीं होती ।
साभार:- इंटरनेट महोदय!!
Monday, 19 March 2018
ललकी गमछी
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ख्याति इसकी गजब नाम की।
समाज का मान-मरजाद है।
भोजपुरिहा का उपहार हैं ।
सुखद, सहज और लायक हैं ।
फुरती, साहस और जुनून भरती हैं ।
सोचो इसकी कितनी अहमियत हैं ।
बोझ बाँधने में भी एकदम लायक हैं ।
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sujit1992.blogspot.com
Friday, 9 March 2018
एक यात्रा ऐसा भी ।
#एक_यात्रा_ऐसा_भी
आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो से जाने का नहीं था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।
बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते, चलना है क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!
मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।
हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।
रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?
अवाक हुआ इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।
याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?
दिये निकाला रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।
वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।
एक यात्रा ऐसा भी ।
#एक_यात्रा_ऐसा_भी
आज निकला मैं स्टेशन के लिए
साथ में था दो बड़ा-बड़ा सा बैग
मेट्रो से जाने का नहीं था मन
यूँही निकले रिक्शे के लिए हम ।
बार-बार रिक्शेवाले आते-जाते
पूछते, चलना है क्या स्टेशन ?
मैं भी पूछता जाने क्या लोगे?
चालीस पचास रुपये सुनकर!
मैंने बोला बीस रुपये लोगे क्या?
सब आते घूमते हुए निकल जाते
हुआ नहीं कोई राजी छोड़ एक
पचास साल के बूढ़े पुराने बाबा ।
हुआ मैं सवार उस रिक्शे पर
रास्ते में था ट्रैफिक घनघोर
बचते-बचाते धीरे-धीरे चलते
फिर रुकते,फिर चलते-रुकते ।
रास्ते में दूसरे गाड़ी वालों की
यदा-कदा बात भी सुनते हुए
पल भर में दिमाग अड़ गया
भई,ऐसी भी क्या जिंदगी है?
अवाक हुआ इस सवारी से
पैर के जोर निरंतर देख कर
बूढ़े बाबा की पगड़ी सरकती
किसी तरह स्टेशन पहुँचाती।
याद किया अपना एक दिन
रोटी मुश्किल होती दो जून
जिंदगी लगी सच में जंग हैं
ट्रैफिक में दुर्घटना क्या कम हैं?
दिये निकाला रुपये पचास
उनको नहीं थी इतनी आस
सन्तुष्ट हुआ पहले उतरकर
देख उनका मन टटोलकर ।
वास्तव में बहुत गरीब हैं हम और हमारा समाज ।
Wednesday, 7 March 2018
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस ।
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
पालन करती हुँ, पोषण करती हूँ,
भूखे तन को तृप्त करती हूँ तन से ।
सर सहलाती हुँ,आँचल का अम्बर बनाती हुँ
लोरिया सुनाती हुँ खुद जग-जगकर ।
मेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
बोझ बनती हुँ, बिन भविष्य के सुन,
सहती हुँ हर चिर-वियोग और ताने-बाने
चौखट के अंदर सब सहती हुँ,
रीति-रिवाजों की कड़ियों से बंधी सुलगती
मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
देख उसे किसी ने त्याग किया
पत्थर शिला को देख किसी ने उद्धार किया
बस यही मेरी कहानी है ।
तोड़ूंगी हर बंधन को मैं
नित नए रूप दिखाउँगी
Sunday, 4 March 2018
दो राजधानियों की प्रेम कहानी ♥️👇👇
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How r u????
Meet me after class......
गोप भरौली, बक्सर